
नई दिल्ली. पश्चिम एशिया में जारी युद्ध जैसे हालात ने भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़ा दिया है. कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों के $104 प्रति बैरल के पार पहुंचने से न केवल ईंधन, बल्कि साबुन, बिस्किट और इलेक्ट्रॉनिक सामान भी महंगे हो गए हैं. ईवाई इंडिया के अनुसार, यह मंदी और महंगाई का असर अगले दो साल तक बना रह सकता है.
आम आदमी पर पड़ने वाला सीधा असर
रसोई का बजट बिगड़ा: भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरतों का 57% आयात करता है. पाम ऑयल, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल की कीमतों में 7% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है.
इलेक्ट्रॉनिक्स में 15% की तेजी: कच्चा माल महंगा होने और ढुलाई की लागत बढ़ने से वॉशिंग मशीन, फ्रिज और LED टीवी जैसी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स वस्तुओं के दाम 15% तक बढ़ गए हैं.
'श्रिंकफ्लेशन' का दौर: FMCG कंपनियां (जैसे साबुन, बिस्किट, पेस्ट) दाम बढ़ाने के बजाय पैकेट का साइज छोटा कर रही हैं. इसे अर्थशास्त्र में 'श्रिंकफ्लेशन' कहा जाता है.
सप्लाई चेन प्रभावित: पेट्रोकेमिकल डेरिवेटिव की किल्लत के कारण शैंपू और सर्फैक्टेंट (साबुन का कच्चा माल) की सप्लाई बाधित हो रही है, जिससे आने वाले दिनों में और किल्लत बढ़ सकती है.
क्यों बढ़ रही हैं कीमतें?
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत विफल होने से होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ा है. चूंकि पेंट, टेक्सटाइल और पर्सनल केयर उद्योग पूरी तरह कच्चे तेल के डेरिवेटिव्स पर निर्भर हैं, इसलिए इन क्षेत्रों में लागत का बढ़ना तय माना जा रहा है.
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