
मुरैना। राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य के अंतर्गत आने वाले देवरी घड़ियाल इको-सेंटर में शनिवार को एक बार फिर भारी चहल-पहल और रौनक देखने को मिली। केंद्र के कृत्रिम हैचिंग यूनिट में रखे गए अंडों से नन्हें घड़ियालों के बाहर आने का सिलसिला लगातार जारी है। शनिवार को वैज्ञानिकों और वन्यजीव विशेषज्ञों की देखरेख में निर्धारित तापमान पर कराई गई हैचिंग के माध्यम से 41 अंडों से नन्हें घड़ियालों ने जन्म लिया। इन नवजातों के आते ही केंद्र के कुंड पानी में इनकी चंचलता और जलक्रीड़ा से जीवंत हो उठे। सबसे खास बात यह रही कि शनिवार को हुई इस प्रक्रिया में सफलता की दर शत-प्रतिशत दर्ज की गई, यानी सभी 41 अंडों से सुरक्षित रूप से बच्चों का जन्म हुआ।
चंबल नदी में घड़ियालों के कुनबे को बढ़ाने और उनकी प्रजाति को सुरक्षित रखने के लिए हर साल वन्यजीव विभाग द्वारा एक विशेष अभियान चलाया जाता है। इसके तहत नदी के विभिन्न संवेदनशील घाटों से औसतन 200 अंडों का संग्रहण (कलेक्शन) किया जाता है। प्राकृतिक रूप से चंबल के घाटों पर घोंसलों में बाढ़ या अन्य हिंसक जीवों से अंडों के नष्ट होने का खतरा बना रहता है, जिससे बचाने के लिए इन्हें देवरी हैचरी सेंटर लाया जाता है। इस साल भी विभाग की टीम बाबू सिंह घेर और बरौली घाट जैसे प्रमुख घड़ियाल निवास स्थलों से सुरक्षित रूप से 200 अंडे लेकर आई थी। अनुकूल और नियंत्रित वातावरण में रखे जाने के कारण इस सीजन में अब तक कुल 194 अंडों से बच्चों का सफल जन्म कराया जा चुका है, जो संरक्षण की दिशा में एक बड़ी कामयाबी है।
शनिवार को अंडों से बाहर आते ही इन नवजात शिशुओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए विशेष प्रोटोकॉल का पालन किया गया। संक्रमण से बचाने के लिए जन्म के तत्काल बाद इन बच्चों को पोटेशियम परमेगनेट के औषधीय घोल में रखा गया। इस प्राथमिक उपचार के बाद, जब नन्हें घड़ियाल पूरी तरह सक्रिय हो गए, तो उन्हें देवरी सेंटर परिसर में बने छोटे-छोटे कृत्रिम कुंडों में छोड़ दिया गया, जहां वे तैरना सीख रहे हैं। देवरी घड़ियाल केंद्र के प्रभारी श्याम सिंह चौहान ने बताया कि अंडों से बच्चों के निकलने का यह सिलसिला मई महीने से ही चरणबद्ध तरीके से चल रहा है। इससे पहले गुरुवार, 4 जून को एक साथ 95 अंडों से बच्चे निकले थे, जबकि 27 मई को 29 और 23 मई को 70 बच्चों ने जन्म लिया था।
इन नन्हें घड़ियालों को तुरंत प्राकृतिक नदी में नहीं छोड़ा जाएगा, क्योंकि वहां बड़े मगरमच्छों, मछलियों या अन्य खतरों से इनकी जान को जोखिम रहता है। योजना के अनुसार, इन सभी नवजातों को अगले करीब तीन वर्षों तक देवरी सेंटर के सुरक्षित और अनुकूलित वातावरण में ही पाला-पोसा जाएगा। इस दौरान विशेषज्ञ उनकी खुराक और शारीरिक विकास की कड़ाई से निगरानी करेंगे। जब ये बच्चे करीब तीन साल के हो जाएंगे और उनकी लंबाई चंबल की लहरों और वहां के वन्यजीवन का सामना करने के लिए निर्धारित मापदंडों के अनुसार पर्याप्त हो जाएगी, तब इन्हें वापस चंबल नदी के स्वच्छ पानी में उनके प्राकृतिक आवास में मुक्त कर दिया जाएगा।
Leave A Reviews