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'ऑपरेशन सिंदूर' पहले के सभी संघर्षों से पूरी तरह अलग, 88 घंटे में बदली युद्ध की परिभाषा: सीडीएस जनरल अनिल चौहान


नई दिल्ली, 16 मई (आईएएनएस)। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने शनिवार को दिल्ली में आयोजित 'सेना से संवाद' कार्यक्रम को संबोधित किया। इस कार्यक्रम में उन्होंने सशस्त्र बलों के जज्बे, बलिदान, नागरिकों और युवाओं के साथ उनके गहरे जुड़ाव पर विस्तार से प्रकाश डाला। सीडीएस ने हालिया 'ऑपरेशन सिंदूर' को लेकर महत्वपूर्ण खुलासे किए।

नई दिल्ली, 16 मई (आईएएनएस)। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने शनिवार को दिल्ली में आयोजित 'सेना से संवाद' कार्यक्रम को संबोधित किया। इस कार्यक्रम में उन्होंने सशस्त्र बलों के जज्बे, बलिदान, नागरिकों और युवाओं के साथ उनके गहरे जुड़ाव पर विस्तार से प्रकाश डाला। सीडीएस ने हालिया 'ऑपरेशन सिंदूर' को लेकर महत्वपूर्ण खुलासे किए।

जनरल अनिल चौहान ने कहा, "मैं सिर्फ फौजी नजरिए से बात करूंगा। ऑपरेशन सिंदूर अलग है। यह अभी जारी है, इसलिए मैं कह रहा हूं कि यह पहले लड़े सभी संघर्षों से अलग है। पहली बार यह एक मल्टी-डोमेन ऑपरेशन था। हमने तीनों डोमेन (स्थल, जल और वायु) में समन्वित तरीके से काम किया। यह ज्यादातर नॉन-कॉन्टैक्ट लड़ाई थी, जबकि अतीत में लगभग सभी लड़ाइयों में सीधा संपर्क होता था।"

उन्होंने बताया कि इस ऑपरेशन में साइबर और अंतरिक्ष क्षमताओं का भी प्रभावी उपयोग किया गया। उन्होंने कहा, "88 घंटे चले इस ऑपरेशन में न सिर्फ तीनों सेनाओं के बीच, बल्कि सरकार के अन्य अंगों और विभिन्न एजेंसियों के साथ भी अभूतपूर्व तालमेल देखने को मिला।"

सीडीएस ने जीत के पारंपरिक पैमानों के बारे में बताते हुए कहा, "पहले जीत इस बात से मापी जाती थी कि कितना इलाका कब्जाया गया, कितने युद्धबंदी बनाए गए या कितना सामान नष्ट किया गया, लेकिन अब 300-400 किलोमीटर दूर से सटीक हमला किया जा सकता है। यह पहले कभी नहीं हुआ था। इसलिए यह ऑपरेशन पूरी तरह से अलग था।"

जनरल अनिल चौहान ने अपनी सिविलियन पृष्ठभूमि का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया, "मैं सिविलियन बैकग्राउंड से आता हूं। पिछली 2-3 पीढ़ियों में मेरे परिवार से कोई सशस्त्र बलों में नहीं रहा। मेरी सिर्फ एक बेटी है, जो आर्किटेक्ट है और उसकी शादी भी एक आर्किटेक्ट से हुई है। इसलिए आगे परिवार से कोई ऑफिसर रैंक में नहीं होगा, जब तक उनके बच्चे खुद फैसला न करें।"

उन्होंने अपने फील्ड अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने मणिपुर के सेनापति जिले में ब्रिगेड की कमान संभाली थी। इसके अलावा बारामूला में ब्रिगेड की जिम्मेदारी भी उनके पास रही। दोनों जगहें उग्रवाद प्रभावित रही हैं।

उन्होंने कहा, "15-20 साल बाद भी सेनापतिऔर बारामूला के लोग मुझे याद करते हैं और संपर्क करते हैं। यह लोगों पर केंद्रित संघर्ष है, जहां मानवीय भूगोल बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सीडीएस बनने के बाद मैं बारामूला गया, लेकिन सेनापति नहीं जा पाया। वहां जाना यह मेरी दिली इच्छा है।"

जनरल चौहान ने दो गांवों (नेलांग और जादुंग) को फिर से बसाने में अपनी भूमिका का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन गांवों को पुनर्वासित करने में सफलता मिलना उनके लिए बेहद संतोषजनक रहा। इसके अलावा उन्होंने तवांग में मेजर बॉब खाथिंग के नाम पर संग्रहालय स्थापित करने में अपनी भूमिका बताई। उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल बी.डी. मिश्रा और मुख्यमंत्री पेमा खांडू के सहयोग से यह संग्रहालय तैयार हुआ। उन्होंने कहा, "जब सरकारी कर्तव्यों से हटकर ऐसे प्रयास सफल होते हैं, तो बहुत खुशी मिलती है।"

सीडीएस ने ‘सेना से संवाद’ कार्यक्रम के जरिए युवाओं को सशस्त्र बलों से जोड़ने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सैनिकों का बलिदान और उनका जज्बा देश की एकता और सुरक्षा की नींव है। नागरिकों को सेना की भावनाओं और चुनौतियों को समझना चाहिए।

--आईएएनएस

एससीएच/वीसी

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