
पन्ना। मझगांय बांध से प्रभावित किसानों और आदिवासियों का चिता आंदोलन नौवें दिन और अधिक तीव्र हो गया। एक ओर आंदोलन को रोकने के लिए प्रशासनिक दबाव, नोटिस और अन्य कदम उठाए जाने का आरोप आंदोलनकारियों ने लगाया है, वहीं दूसरी ओर आंदोलनकारियों ने अपने संघर्ष को और व्यापक करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
अब तक सांकेतिक चिता, जल सत्याग्रह और रात में मशालों के साथ प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों ने शुक्रवार से ‘मिट्टी सत्याग्रह’ भी शुरू कर दिया। आंदोलन स्थल पर ग्रामीणों ने टपरियां बनाकर रहने की व्यवस्था की है और लंबे संघर्ष के लिए राशन सहित जरूरी सामान जुटाया है। आंदोलन अब सुबह से शाम तक सीमित नहीं है। देर रात तक मशालें जलाकर ग्रामीण अपने घर, जमीन और विस्थापन का दर्द सामने रख रहे हैं।

आंदोलन के नेतृत्वकर्ता एवं जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने कहा— एक तरफ शासन-प्रशासन आंदोलन को दबाने के लिए लगातार नए-नए प्रयास कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ विस्थापितों का संकल्प हर दिन मजबूत हो रहा है। अब चिता, जल सत्याग्रह और मशालों के साथ मिट्टी सत्याग्रह भी शुरू हो गया है।
भटनागर ने आरोप लगाया कि प्रशासनिक कार्रवाई और पुलिस दबाव के जरिए लोकतांत्रिक आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। शासन-प्रशासन दमन करके लोकतंत्र का चीरहरण कर रहा है। पुलिस के दम पर आंदोलन समाप्त करने की कोशिश से हमारी मांगें समाप्त नहीं होंगी। अगर मुझे भी जेल में डाल दिया जाता है, तब भी ग्रामीणों का आंदोलन जारी रहेगा।
उन्होंने कहा कि आंदोलन किसी व्यक्ति या अधिकारी के खिलाफ नहीं बल्कि प्रभावित परिवारों के अधिकार, न्यायपूर्ण मुआवजे और पुनर्वास के लिए है।

अमित भटनागर ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा— “हमारा आरोप है कि निर्माण से लेकर मुआवजे और पुनर्वास तक पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है। सर्वे हो, निर्माण कार्य हो या मुआवजे का निर्धारण—हर स्तर पर भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आ रही हैं। इसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि कई गांव उजाड़े जा रहे हैं अथवा डूब की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन अनेक परिवारों को उनके अनुसार पूरा मुआवजा और पुनर्वास नहीं मिला है। “जब गांव डूबने जा रहा है, तब यह बताना महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी को कितना पैसा दिया गया। महत्वपूर्ण यह है कि उसका कितना अधिकार अभी बाकी है। जो दिया गया वह उसका हक था, लेकिन जो बाकी रह गया, उसकी जिम्मेदारी प्रशासन की है।”

रमिया आदिवासी की मौत का जिक्र करते हुए भटनागर ने कहा कि एक आदिवासी महिला की मौत के बाद भी प्रशासन केवल यह बता रहा है कि कितनी राशि दी गई थी। यह क्यों नहीं बताया जा रहा कि परिवार को क्या-क्या मिलना बाकी था और पुनर्वास की स्थिति क्या थी? डूबते गांव के बीच परिवार की चिंता को भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए।”आंदोलनकारियों का कहना है कि रमिया बाई के मामले में उपलब्ध दस्तावेजों और परिवार के बयानों के आधार पर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
आंदोलनकारियों ने बताया कि मिट्टी सत्याग्रह के माध्यम से प्रभावित परिवार उस जमीन से अपने भावनात्मक और जीवनगत जुड़ाव को सामने रख रहे हैं, जिस पर पीढ़ियों से उनका जीवन निर्भर रहा है।
प्रभावितों का कहना है कि “यह मिट्टी सिर्फ जमीन नहीं है। इसी में लोगों के घर, खेत, पुरखों की यादें और उनका जीवन जुड़ा है। जब इसी मिट्टी से उन्हें विस्थापित किया जा रहा है तो मिट्टी सत्याग्रह के जरिए हम अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से देश और सरकार तक पहुंचा रहे हैं।”

प्रशासन की अनुमति के सवाल पर अमित भटनागर ने कहा— “हम किसी सार्वजनिक सड़क को बंद करके या आम लोगों को परेशान करके आंदोलन नहीं कर रहे हैं। प्रभावित ग्रामीण अपने ही गांव में अपनी समस्याओं को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से बैठे हैं। हमारा कहना है कि गांव में ग्रामीणों द्वारा किए जा रहे शांतिपूर्ण सत्याग्रह को समझने के बजाय प्रशासन बार-बार दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।”
उन्होंने कहा कि प्रशासन यदि किसी विशेष गतिविधि के लिए अनुमति अथवा कानून-व्यवस्था संबंधी औपचारिकता आवश्यक मानता है तो उसे स्पष्ट कानूनी आधार के साथ बताया जाना चाहिए, न कि केवल दबाव के माध्यम से आंदोलन समाप्त करने का प्रयास किया जाए।

भटनागर ने कहा— “मुझे जेल में डाल देंगे तो क्या गांवों का पानी रुक जाएगा? क्या लोगों का मुआवजा मिल जाएगा? क्या विस्थापन की समस्या खत्म हो जाएगी? आंदोलनकारी पीछे हटने वाले नहीं हैं। जब तक प्रभावित परिवारों को न्याय नहीं मिलता, संघर्ष जारी रहेगा।”


Leave A Reviews