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राष्ट्रपति मुर्मू का आह्वान: 'अमीर-गरीब की खाई पाटें, जातिगत विभाजन अब अतीत की बात, गुजरात में सामाजिक समरसता महोत्सव

गांधीनगर: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार को गुजरात के गांधीनगर में आयोजित 'सामाजिक समरसता महोत्सव' के दौरान देशवासियों से एक समावेशी और भेदभाव मुक्त समाज के निर्माण की भावुक अपील की। डॉ. बी.आर. अंबेडकर की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने कहा कि अब समय आ गया है जब हमें जातिगत बेड़ियों को पीछे छोड़कर 'अमीर और गरीब' के बीच के अंतर को खत्म करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इस अवसर पर गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत, मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी भी मंच पर उपस्थित थे।

"अब केवल दो ही जातियां हैं: अमीर और गरीब"

राष्ट्रपति मुर्मू ने सामाजिक एकता पर जोर देते हुए कहा कि जाति व्यवस्था अब अतीत का हिस्सा होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, "जिन्होंने जाति व्यवस्था बनाई, वे अब नहीं रहे। अब केवल दो ही जातियां शेष हैं—'हैव्स' (अमीर) और 'हैव-नॉट्स' (गरीब)। हमें पिछड़ों के उत्थान के लिए मिलकर काम करना चाहिए।" उन्होंने आह्वान किया कि किसी को भी केवल अपने स्वार्थ के बारे में नहीं सोचना चाहिए, क्योंकि हम सब एक ही राष्ट्र के भाई-बहन हैं।

गांवों की समृद्धि में बसती है भारत की आत्मा

ग्रामीण विकास को राष्ट्र की प्रगति का आधार बताते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है। उन्होंने कहा कि विविधता के बावजूद गांवों में जो स्नेह और आपसी समझ है, वही भारतीय संस्कृति की असली पहचान है। राष्ट्रपति के अनुसार, "सामंजस्यपूर्ण समाज का मार्ग गांवों से होकर गुजरता है। यदि हमारे गांव समृद्ध और आत्मनिर्भर होंगे, तभी देश वास्तविक रूप से समृद्ध कहलाएगा।"

शिक्षा और नैतिक मूल्यों पर बाबा साहेब का संदेश

डॉ. अंबेडकर के 'शिक्षित बनो' के नारे को याद करते हुए राष्ट्रपति ने शिक्षा को व्यक्तिगत और राष्ट्रीय विकास की आधारशिला बताया। उन्होंने कहा कि संविधान ने शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया है, अतः यह सुनिश्चित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि शहरों से लेकर सुदूर गांवों के हाशिए पर खड़े लोगों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचे। उन्होंने शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों, स्वच्छता और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के महत्व पर भी प्रकाश डाला।

सफलता तभी सार्थक, जब आप दूसरों की मदद करें

समारोह के अंत में राष्ट्रपति ने एक प्रेरक संदेश साझा करते हुए कहा कि व्यक्तिगत सफलता तभी सार्थक है जब वह समाज के काम आए। उन्होंने कहा, "आप भले ही पूरे राष्ट्र को न बदल सकें, लेकिन आपको खुद से यह पूछना चाहिए कि आप अपने स्तर पर कितने लोगों की मदद कर सकते हैं।" उन्होंने सरकार के प्रयासों के साथ-साथ आम जनता को भी आत्मनिर्भर बनने और वृक्षारोपण, पशुपालन व स्वच्छता जैसे सामाजिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया।

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