
रामनगर से प्रकृति के विनाश की एक खौफनाक तस्वीर सामने आ रही है। वन, राजस्व, खनिज अमले और ग्राम पंचायतों की गहरी मिलीभगत से रामनगर अवैध खनन का काला कारोबार अपने चरम पर है। इस बेतहाशा रामनगर अवैध खनन के कारण क्षेत्र की हरी-भरी पहाड़ियां और चरागाह की जमीनें गहरी खाइयों में तब्दील हो गई हैं।
प्राकृतिक परितंत्र को पूरी तरह खत्म किया जा रहा है। इस रामनगर अवैध खनन का सबसे बुरा असर बेजुबान वन्यजीवों पर पड़ रहा है। जंगल उजड़ने से बंदर, भालू, हाथी, सियार, लकड़बग्घे, जंगली सुअर और नीलगाय जैसे जंगली जानवर अब भोजन-पानी की तलाश में शहरों और गांवों की तरफ पलायन कर रहे हैं। इससे ग्रामीणों का जीवन भी खतरे में पड़ गया है।

विकास के नाम पर बाणसागर और रामनगर के बीच स्थित ग्रामों में अंधाधुंध खाई खोदी जा रही है। कहीं बड़ी सीमेंट कंपनियां लगातार पहाड़ों को निगल रही हैं, तो कहीं क्रेशर मशीनें पहाड़ियों को चबा रही हैं। इस रामनगर अवैध खनन के कारण सरकारी सार्वजनिक जमीन, पशुओं के चरागाह और उनकी रिहायश पूरी तरह से खत्म हो चुके हैं।
पहले जेपी एसोसिएट्स, और अब अल्ट्राटेक या एसीसी जैसी कंपनियों के लिए खनिज माफिया बेखौफ होकर गिट्टी, मुरूम, चूना पत्थर और मिट्टी निकाल रहे हैं। यह रामनगर अवैध खनन कई दशकों से इसी तरह फल-फूल रहा है।

रामनगर क्षेत्र के दर्जनों गांव इस तबाही का सीधा दंश झेल रहे हैं। जिगना, खोडरी, बिंदुनगर, मझगंवा, हटवा, गोरसरी, लक्ष्मणपुर, जुड़मानी, हिनौती, अरगट, झिन्ना, मर्यादपुर, कंदवारी, सरिया, भैसरहा, मनकिसर, करहिया और कैथा जैसे ग्रामों में स्थित पहाड़ियां, मैदान और तालाब अब पूरी तरह समतल हो चुके हैं। इस भारी रामनगर अवैध खनन ने पूरे क्षेत्रीय भविष्य को दांव पर लगा दिया है।
सोन घड़ियाल जैसे संरक्षित क्षेत्रों और कुबरी जैसे गांवों में धड़ल्ले से चल रही बालू की खदानें एक अलग ही कहानी बयां कर रही हैं। मैहर जिला कलेक्टर द्वारा गठित प्रशासनिक अमला केवल कोरम पूर्ति (दिखावे की कार्रवाई) करके आराम फरमा रहा है।
प्रशासनिक मिलीभगत और क्षेत्रीय सफेदपोश दलालों के गठजोड़ से प्रकृति की बाट लग चुकी है। अगर आज इस भयानक रामनगर अवैध खनन पर कठोरता से रोक नहीं लगाई गई, तो प्राकृतिक परितंत्र को खत्म कर पनपने वाली कोई भी सभ्यता भविष्य में खुद को नहीं बचा पाएगी।
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