
नई दिल्ली. ईरान युद्ध और उसके बाद पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट ने दक्षिण एशिया के कई देशों की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। खासतौर पर बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका जैसे देश, जो बड़े पैमाने पर ईंधन आयात पर निर्भर हैं, गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। इस मुश्किल घड़ी में वही देश, जहां कभी भारत विरोधी माहौल था, अब मदद के लिए भारत की ओर रुख कर रहे हैं।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ से तेल आपूर्ति प्रभावित होने के कारण इन देशों में ईंधन की भारी कमी हो गई है। बांग्लादेश, जो अपनी 95% तेल जरूरतें आयात करता है, वहां बिजली संकट गहरा गया है। उद्योग-धंधे ठप होने की कगार पर हैं और विश्वविद्यालयों तक को बंद करना पड़ा है। ऐसे में भारत ने तेजी से मदद करते हुए फ्रेंडशिप पाइपलाइन के जरिए डीजल की सप्लाई बढ़ा दी है।
मालदीव, जहां हाल तक ‘इंडिया आउट’ अभियान चल रहा था, अब ईंधन संकट से जूझ रहा है। पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था पर असर और पेट्रोल-डीजल की कमी ने वहां हालात बिगाड़ दिए हैं। इस स्थिति में मालदीव ने भी भारत से सहायता मांगी है। भारत इस अनुरोध पर विचार कर रहा है और मानवीय आधार पर सहयोग की नीति अपनाए हुए है।
श्रीलंका, जो 2022 के आर्थिक संकट से उबरने की कोशिश कर रहा था, एक बार फिर ऊर्जा संकट से घिर गया है। देश की 60% ऊर्जा जरूरतें आयात पर निर्भर हैं। हालात को देखते हुए श्रीलंका के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संपर्क किया, जिसके बाद भारत ने तुरंत 38,000 मीट्रिक टन ईंधन भेजकर मदद पहुंचाई।
भारत ने न केवल इन देशों की मदद की है, बल्कि नेपाल और भूटान को भी लगातार ईंधन आपूर्ति जारी रखी है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, सभी अनुरोधों पर देश की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए केस-बाय-केस आधार पर निर्णय लिया जा रहा है। फिलहाल भारत के पास करीब दो महीने का ईंधन भंडार मौजूद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका बेहद अहम है। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, भौगोलिक और रणनीतिक वास्तविकताएं यही संकेत देती हैं कि संकट के समय भारत ही क्षेत्र का सबसे बड़ा भरोसेमंद साझेदार है।
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