
नई दिल्ली। देश के अधिकांश हिस्से इस समय भीषण गर्मी और जानलेवा लू (Heatwave) की चपेट में हैं, जहाँ पारा 45 से 48 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर गया है। दिल्ली-एनसीआर में तापमान 45 डिग्री के ऊपर बना हुआ है, जबकि उत्तर प्रदेश के बांदा में यह 47 डिग्री से अधिक दर्ज किया गया। मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के पीछे भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में आकार ले रहा एक शक्तिशाली 'सुपर एल-नीनो' है। यह मौसमी बदलाव इतना खतरनाक है कि यह साल 1877 (लगभग 150 साल पहले) के बाद की सबसे विनाशकारी प्राकृतिक घटना साबित हो सकता है, जिसने उस दौर में दुनिया की करीब 4 फीसदी आबादी को लील लिया था।
विशेषज्ञों के अनुसार, चालू वर्ष 2026 में मई से जुलाई के बीच एल-नीनो विकसित होने की संभावना 82 प्रतिशत है, जो दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक 96 प्रतिशत तक मजबूत हो सकती है। सामान्य एल-नीनो तब होता है जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, लेकिन 'सुपर एल-नीनो' की स्थिति में यह वृद्धि 2 से 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकती है। इसके प्रभाव से वैश्विक पवन पैटर्न बदल जाते हैं, जिससे दुनिया भर में सूखा, बाढ़ और अत्यधिक गर्मी का चक्र शुरू हो जाता है। भारत में वर्तमान भीषण गर्मी के लिए आसमान का साफ होना, कंक्रीट के बढ़ते जाल (अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट), वाहनों और एसी (AC) से निकलने वाली गर्मी जैसे स्थानीय कारण भी जिम्मेदार हैं।
इस सुपर एल-नीनो का सबसे घातक असर भारत की लाइफलाइन कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ने जा रहा है, जो देश की सालाना बारिश का 70 प्रतिशत हिस्सा तय करता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, इस मानसून सीजन में देश में केवल 800 मिलीमीटर (LPA का लगभग 92%) के आसपास ही बारिश होने का अनुमान है, जो इसे 'सामान्य से कम' की श्रेणी में खड़ा करता है। इस मानसूनी संकट के कारण देश के लगभग 60 प्रतिशत किसान, जो पूरी तरह सिंचाई के लिए बारिश पर निर्भर हैं, उनके सामने खरीफ की फसलों को बचाने का भारी संकट खड़ा हो सकता है।
आर्थिक मोर्चे पर भी यह सुपर एल-नीनो दुनिया और भारत के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है। इतिहास गवाह है कि 1982-83 के एल-नीनो से वैश्विक अर्थव्यवस्था को 4.1 ट्रिलियन डॉलर और 1997-98 के एल-नीनो से 5.7 ट्रिलियन डॉलर का भारी नुकसान हुआ था। आईएमडी (IMD) की भविष्यवाणियों के मुताबिक, इस बार भारत के उत्तरी, पश्चिमी और मध्य भागों में जहां सूखे और अत्यधिक खाद्यान्न संकट का सबसे बड़ा खतरा रहेगा, वहीं दूसरी ओर चेन्नई और तटीय तमिलनाडु जैसे दक्षिणी हिस्सों में पूर्वोत्तर मानसून के दौरान अत्यधिक भारी बारिश होने से तबाही और व्यापक बाढ़ की गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।
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