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विदेश मंत्रालय तकनीकी तौर पर सही, लेकिन पासपोर्ट नागरिकता का भी प्रमाण: सुप्रीम कोर्ट के वकील


नई दिल्ली, 25 जून (आईएएनएस)। भारतीय विदेश मंत्रालय (एमईए) ने एक बयान में कहा कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है और यह नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। मंत्रालय के इस बयान के बाद देश में एक नई बहस शुरू हो गई है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता ने कहा कि तकनीकी तौर पर विदेश मंत्रालय सही है, लेकिन इसकी अनिवार्य आवश्यकताएं देखें तो यह केवल भारतीयों को ही दिया जा सकता है। इसलिए इसे नागरिकता के प्रमाण के तौर पर भी देखा जा सकता है।

नई दिल्ली, 25 जून (आईएएनएस)। भारतीय विदेश मंत्रालय (एमईए) ने एक बयान में कहा कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है और यह नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। मंत्रालय के इस बयान के बाद देश में एक नई बहस शुरू हो गई है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता ने कहा कि तकनीकी तौर पर विदेश मंत्रालय सही है, लेकिन इसकी अनिवार्य आवश्यकताएं देखें तो यह केवल भारतीयों को ही दिया जा सकता है। इसलिए इसे नागरिकता के प्रमाण के तौर पर भी देखा जा सकता है।

आईएएनएस से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि तकनीकी दृष्टि से विदेश मंत्रालय का बयान सही है, क्योंकि पासपोर्ट अधिनियम 1967 के तहत पासपोर्ट एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है, जिसका उपयोग केवल विदेश यात्रा के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार यह दस्तावेज नागरिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है।

विराग गुप्ता ने यह भी कहा कि यदि पासपोर्ट की अनिवार्य शर्तों को देखा जाए तो यह केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है। पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 के तहत यदि कोई व्यक्ति गलत जानकारी देकर या धोखाधड़ी से पासपोर्ट प्राप्त करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई और सजा का प्रावधान है। वहीं धारा 20 में यह भी व्यवस्था है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी केंद्र सरकार की अनुमति से पासपोर्ट जारी किया जा सकता है।

उनका कहना है कि इस व्यावहारिक ढांचे को देखते हुए यह कहना कि पासपोर्ट का नागरिकता से कोई संबंध नहीं है, पूरी तरह सही नहीं लगता। उन्होंने कहा कि यह दस्तावेज अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकता से जुड़ा हुआ है, क्योंकि यह सामान्यतः केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है।

विराग गुप्ता ने आगे कहा कि भारत में नागरिकता को लेकर संविधान के भाग-2 में स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। नागरिकता का निर्धारण केंद्र सरकार के स्तर पर होता है और इसके लिए कोई एकल और सार्वभौमिक नागरिकता कार्ड जैसी व्यवस्था भारत में मौजूद नहीं है। इसी कारण पासपोर्ट और मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) को कई बार नागरिकता के महत्वपूर्ण संकेतक के रूप में देखा जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया में वोट देने का अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को ही प्राप्त है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 326 में उल्लेखित है। इसलिए मतदाता सूची में नाम होना भी नागरिकता के एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में माना जाता है। इसी तरह पासपोर्ट भी नागरिकता का एक मजबूत अप्रत्यक्ष प्रमाण माना जा सकता है, क्योंकि इसे प्राप्त करने के लिए कई स्तरों पर सत्यापन किया जाता है।

वकील विराग गुप्ता ने कहा कि भारत में विदेशों की तरह कोई अलग नागरिकता कार्ड प्रणाली नहीं है, जिसके कारण कई बार भ्रम की स्थिति पैदा होती है। उन्होंने कहा कि पासपोर्ट, आधार कार्ड, राशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे दस्तावेज पहचान और पते के प्रमाण के रूप में तो काम करते हैं, लेकिन नागरिकता के अंतिम और औपचारिक निर्धारण का अधिकार केंद्र सरकार के पास ही है।

उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में नागरिकता से जुड़े मुद्दों पर बहसें बढ़ी हैं, खासकर मतदाता सूची के सत्यापन और जनगणना जैसे अभियानों के दौरान। उन्होंने कहा कि यह चिंता का विषय है कि देश में नागरिकता से जुड़े डेटा को लेकर स्पष्ट और एकीकृत प्रणाली अभी तक विकसित नहीं हो सकी है।

विराग गुप्ता ने सुझाव दिया कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि किन दस्तावेजों को नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है और किन्हें केवल पहचान दस्तावेज माना जाए। उन्होंने कहा कि अगर 90-95 फीसदी लोगों को अगर हम सिर्फ नागरिकता साबित करने में लगा देंगे तो न सिर्फ पासपोर्ट की संवैधानिक स्थिति कमजोर होगी बल्कि भारत में अराजकता बढ़ने का खतरा है।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर नागरिकता के प्रमाण को लेकर बार-बार सवाल उठते रहेंगे, तो इससे प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। साथ ही यह भी जरूरी है कि केवल संदिग्ध मामलों की ही जांच की जाए, न कि पूरे देश की जनसंख्या को संदेह के दायरे में लाया जाए।

--आईएएनएस

पीआईएम/वीसी

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