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यूएनईपी बैठक में भारत की दो टूक: प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए संतुलित और न्यायपूर्ण नीति जरूरी


नैरोबी, 30 जून (आईएएनएस)। यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम (यूएनईपी) में भारत के स्थायी प्रतिनिधि आदर्श स्वैका ने मंगलवार को नैरोबी में इनफॉर्मल हेड्स ऑफ डेलीगेशन्स (एचओडी) की बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। यह बैठक प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करने के लिए इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएटिंग कमेटी (आईएनसी) के अगले सत्र से पहले हुई।

नैरोबी, 30 जून (आईएएनएस)। यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम (यूएनईपी) में भारत के स्थायी प्रतिनिधि आदर्श स्वैका ने मंगलवार को नैरोबी में इनफॉर्मल हेड्स ऑफ डेलीगेशन्स (एचओडी) की बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। यह बैठक प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करने के लिए इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएटिंग कमेटी (आईएनसी) के अगले सत्र से पहले हुई।

नैरोबी स्थित भारतीय उच्चायोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्‍स' पर लिखा कि स्वैका ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल की ओर से कई अहम सिद्धांतों को सामने रखा और कहा कि भारत एक संतुलित और प्रभावी समझौते के लिए रचनात्मक तरीके से बातचीत करने को तैयार है।

भारत ने जिन प्रमुख बातों पर जोर दिया, उनमें शामिल हैं कि सभी फैसले सहमति से लिए जाने चाहिए ताकि सभी देशों की भागीदारी और जिम्मेदारी बनी रहे। साथ ही, इस समझौते का दायरा सिर्फ प्लास्टिक प्रदूषण तक सीमित होना चाहिए, जैसा कि यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट असेंबली (यूएनईए) के प्रस्ताव 5/14 में तय किया गया है। इसमें दूसरे अंतरराष्ट्रीय समझौतों, खासकर विश्व व्यापार संगठन (डब्‍ल्‍यूटीओ) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्‍ल्‍यूएचओ) से जुड़े मुद्दों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए।

स्वैका ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया सदस्य देशों के नेतृत्व में चलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्राइमरी पॉलीमर (प्‍लास्‍ट‍िक बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल) के उत्पादन पर कोई सीमा या रोक नहीं लगाई जानी चाहिए, ताकि विकास के अधिकार की रक्षा हो सके।

उन्होंने बताया कि इस समझौते को लागू करने की जिम्मेदारी हर देश की अपनी परिस्थितियों के हिसाब से तय होनी चाहिए। इसमें रियो सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए, जिसमें 'साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों' का सिद्धांत भी शामिल है।

भारतीय उच्चायोग ने कहा कि विकासशील देशों को जरूरी सहायता उपलब्ध कराना बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें एक अलग बहुपक्षीय फंड की व्यवस्था और ऐसी प्रक्रिया शामिल होनी चाहिए जो निष्पक्ष, पारदर्शी और सभी को साथ लेकर चलने वाली हो, और जो हर देश की स्थिति और क्षमता को ध्यान में रखे।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सेशेल्स की नेशनल असेंबली में अपने विशेष संबोधन के दौरान जलवायु न्याय में निष्पक्षता और समानता के मुद्दे पर भारत का पक्ष रखा था। यह संबोधन उनके सेशेल्स के आधिकारिक दौरे के दौरान हुआ था।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ग्लोबल साउथ (विकासशील देश) और द्वीपीय देश जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। इसके असर तटों, समुद्री पर्यावरण, मौसम के बदलाव और लोगों के जीवन में साफ दिखाई दे रहे हैं।

उन्होंने कहा, “हम दोनों इस बात में विश्वास रखते हैं कि जिन लोगों का जलवायु परिवर्तन में सबसे कम योगदान रहा है, उन्हें इसके सबसे बड़े नुकसान का बोझ नहीं उठाना चाहिए। जलवायु से जुड़ी कार्रवाई निष्पक्षता, जिम्मेदारी और समानता के आधार पर होनी चाहिए। यही जलवायु न्याय का मतलब है।”

--आईएएनएस

एवाई/डीकेपी

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