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बंगाल में अराजकता: 7 न्यायिक अधिकारी 10 घंटे तक रहे बंधक, सुप्रीम कोर्ट ने दिए CBI/NIA जांच के आदेश

नई दिल्ली/मालदा. पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) प्रक्रिया के दौरान सात न्यायिक अधिकारियों को भीड़ द्वारा बंधक बनाए जाने की घटना पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे "सोची-समझी साजिश" और "न्यायपालिका को डराने का प्रयास" बताते हुए मामले की जांच CBI या NIA जैसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से कराने का निर्देश दिया है.

मुख्य घटनाक्रम: क्या हुआ मालदा में?
बुधवार, 1 अप्रैल 2026 को दोपहर करीब 2:30 बजे, मालदा के कालियाचक (माताबारी) स्थित BDO ऑफिस में सात न्यायिक अधिकारी (जिनमें तीन महिलाएं शामिल थीं) इलेक्शन ऑब्जर्वर के रूप में SIR प्रक्रिया की सुनवाई कर रहे थे. इसी दौरान वोटर लिस्ट से नाम कटने को लेकर नाराज हजारों लोगों की भीड़ ने दफ्तर को घेर लिया.

9 घंटे का खौफ: अधिकारियों को रात 12 बजे तक बंधक बनाकर रखा गया. इस दौरान उन्हें खाना और पानी तक नसीब नहीं हुआ.

प्रशासनिक विफलता: सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि संकट के समय पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव, होम सेक्रेटरी और DGP से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनका रेस्पॉन्स "अत्यंत निराशाजनक" रहा.

हिंसा: जब अधिकारियों को रेस्क्यू किया जा रहा था, तब भी उन पर पत्थर और लाठियों से हमला किया गया.

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बंगाल सरकार को फटकार लगाते हुए कहा:

"यह कोई सामान्य घटना नहीं है. यह न्यायिक अधिकारियों के मन में डर पैदा करने और उन्हें उनके कर्तव्यों से रोकने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास है. यह इस अदालत के अधिकार को चुनौती देने जैसा है."

कोर्ट के प्रमुख निर्देश:

स्वतंत्र जांच: चुनाव आयोग (ECI) इस घटना की जांच CBI या NIA को सौंपे. एजेंसी अपनी रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट को देगी.

सुरक्षा में इजाफा: अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा के लिए तत्काल केंद्रीय बलों (Central Forces) की तैनाती की जाए.

जवाबदेही: मुख्य सचिव और DGP को इस प्रशासनिक विफलता पर स्पष्टीकरण देने के लिए तलब किया गया है.

क्या है SIR (Special Intensive Revision)?
पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची में सुधार के लिए 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' की प्रक्रिया चल रही है. इसमें लाखों नामों को लेकर आपत्तियां दर्ज की गई हैं. न्यायिक अधिकारियों को इन दावों और आपत्तियों के निपटारे की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसका कुछ राजनीतिक दल और स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं.

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