
धार की ऐतिहासिक भोजशाला से जुड़े विवाद में सोमवार को इंदौर हाईकोर्ट (मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय) में एक बड़ा फैसला लिया गया। अदालत अब इस मामले की 2 नियमित सुनवाई 2 अप्रैल 2026 से शुरू करेगी। हालांकि, सुनवाई शुरू होने से पहले हाईकोर्ट के न्यायाधीश स्वयं धार जाकर भोजशाला स्थल का निरीक्षण करेंगे और जमीनी हकीकत का जायजा लेंगे। यह पहला मौका है जब जज खुद मौके पर जाकर वास्तविकता का पता लगाएंगे।
सोमवार को करीब सवा घंटे तक चली सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा पिछले साल किए गए सर्वे पर कड़े सवाल उठाए।
सर्वे को नकारा: मुस्लिम पक्ष ने एएसआई की रिपोर्ट के तथ्यों को खारिज करते हुए कहा कि सर्वे सही तरीके से नहीं किया गया है।
इतिहास का हवाला: उन्होंने अंग्रेजों के शासनकाल में हुए सर्वे का जिक्र करते हुए दावा किया कि उस समय के रिकॉर्ड्स में भी इस परिसर को कमाल मौलाना मस्जिद के रूप में उल्लेखित किया गया था।
जस्टिस की पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले से जुड़े सभी अंतरिम आवेदनों को रिकॉर्ड पर ले लिया गया है और इन्हें मुख्य बहस के साथ ही सुना जाएगा। कोर्ट ने वक्फ बोर्ड द्वारा दिए गए आवेदन को भी संज्ञान में लिया है। अदालत ने कहा, "सभी पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा और बराबर मौका दिया जाएगा।"
पिछले साल एएसआई की टीम ने 98 दिनों तक भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वे किया था और करीब 2000 पन्नों की रिपोर्ट कोर्ट में सौंपी थी। इस रिपोर्ट के मुख्य बिंदु थे:
परमार कालीन निर्माण: भोजशाला का मूल निर्माण परमार काल (राजा भोज के समय) में हुआ था।
पुनर्निर्माण: पुराने ढांचे के ऊपर ही बाद में कुछ नया निर्माण किया गया।
अवशेष: खुदाई के दौरान प्राचीन मूर्तियां, सिक्के और नक्काशीदार पत्थर मिले थे, जिनके फोटोग्राफ भी रिपोर्ट में शामिल हैं।
अब 2 अप्रैल से होने वाली नियमित सुनवाई और उससे पहले जजों का 'साइट इंस्पेक्शन' इस सदियों पुराने विवाद के निपटारे की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।
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