
नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ‘जन्म पत्री’ (कुंडली) को जन्मतिथि का वैध प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने 13 साल पुराने अपहरण और दुष्कर्म के मामले में आरोपी की बरी होने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
जस्टिस रविंदर दुडेजा और जस्टिस नवीन चावला की पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पीड़िता की उम्र इस तरह के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण तत्व होती है और इसे किसी अविश्वसनीय दस्तावेज के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य द्वारा जारी ‘जच्चा-बच्चा रक्षा कार्ड’ भी जन्मतिथि का पुख्ता प्रमाण नहीं माना जा सकता।
यह मामला POCSO Act के तहत दर्ज किया गया था, जिसमें आरोपी पर नाबालिग लड़की के अपहरण और यौन शोषण का आरोप था। राज्य सरकार ने ट्रायल कोर्ट के 2019 के बरी करने के फैसले को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने कहा कि अपहरण और दुष्कर्म के मामलों में पीड़िता की उम्र यह तय करने के लिए अहम होती है कि वह सहमति देने में सक्षम थी या नहीं। लेकिन इस मामले में अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पीड़िता के पिता ने स्कूल में दाखिले के समय ‘जन्म पत्री’ को उम्र के प्रमाण के रूप में दिया था। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि ऐसे दस्तावेजों के आधार पर उम्र निर्धारित नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने पीड़िता के बयान पर भी सवाल उठाए और कहा कि उसमें कई गंभीर विरोधाभास हैं, जो मामले की जड़ को प्रभावित करते हैं। अदालत ने पाया कि आरोपी ने दिल्ली से अमृतसर ले जाने में कोई बल प्रयोग नहीं किया और पीड़िता खुद बस से वहां पहुंची थी।
इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। इसलिए ट्रायल कोर्ट का फैसला उचित और न्यायसंगत है, जिसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
यह फैसला कानून में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और नाबालिग मामलों में उम्र के प्रमाण की अहमियत को फिर से रेखांकित करता है।
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