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मजदूर दिवस का कड़वा सच: उत्सव के शोर के बीच दबी कुटेश्वर गैरतलाई के उन हजारों परिवारों की चीख


कटनी। आज जब पूरा देश श्रमिक दिवस मना रहा है, कटनी जिले के विजयराघवगढ़ विधानसभा क्षेत्र के कुटेश्वर लाइमस्टोन माइंस के हजारों पूर्व श्रमिकों की आँखों में जश्न नहीं, बल्कि 25 साल पुराने वो आँसू हैं जो आज भी सूखे नहीं हैं। भारत सरकार के उपक्रम 'सेल' (SAIL) के अंतर्गत संचालित इन खदानों ने कभी बरही क्षेत्र को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाया था, लेकिन 25 अप्रैल 1996 की उस एक काली तारीख ने हजारों परिवारों का भविष्य अंधकार में डाल दिया।

जब बरही में बहती थी 'मजदूरी' की खुशहाली

एक समय था जब सिंघल, पावर यूनाइटेड, ISS, SKM, MCC और एम टा जैसी छह बड़ी कंपनियों में 20 से 25 हजार मजदूर काम करते थे। साप्ताहिक मजदूरी का आलम यह था कि अकेले बरही के व्यापारियों के पास हर हफ्ते 35 से 40 लाख रुपए पहुँचते थे। सीधी जिले से आए 10-12 हजार मजदूर और स्थानीय गांवों (गैरतलाई, केवलारी, बरही आदि) के 15 हजार मजदूर इस उम्मीद में दफाईयों (झोपड़ियों) में रहते थे कि एक दिन उनका और उनके बच्चों का भविष्य संवर जाएगा।

25 अप्रैल 1996: बिना नोटिस उजाड़ी गई दुनिया

मजदूरों का दुर्भाग्य तब शुरू हुआ जब 25 अप्रैल 1996 को बिना किसी पूर्व सूचना के उन्हें काम से निकाल दिया गया। न ग्रेच्युटी मिली, न बकाया मजदूरी, न बोनस और न ही एरियर। मजदूरों का कसूर सिर्फ इतना था कि वे 17 मार्च 1993 को भारत सरकार द्वारा जारी उस नोटिफिकेशन को लागू करने की मांग कर रहे थे, जो उनके हक में था।

25 वर्षों की कानूनी लड़ाई और 'सर्वोच्च' मायूसी

अपनी पीड़ा लेकर ये श्रमिक देश की हर छोटी-बड़ी अदालत के दरवाजे पर गए। 25 वर्षों तक संघर्ष चला। कई अदालतों ने मजदूरों की पीड़ा को समझा और उनके पक्ष में फैसले सुनाए, लेकिन सेल प्रबंधन सिर्फ अपील पर अपील करता रहा। अंततः, देश की सर्वोच्च संविधान पीठ के एक फैसले ने इन 20 हजार मजदूरों की उम्मीदों को पूरी तरह तोड़ दिया। आज ये मजदूर उसी मोड़ पर खड़े हैं, जहां उनके पास न भरपेट भोजन है, न तन ढकने को कपड़ा और न सिर छिपाने को साया।

एक श्रमिक का संदेश: "हमारा पेट भरने वाला आज खुद भूखा है"

कुटेश्वर माइंस के एक पीड़ित पूर्व श्रमिक ने श्रमिक दिवस पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए अपनी व्यथा साझा की है। उन्होंने कहा, "एक श्रमिक ही सभी देशवासियों का पेट भरता है और श्रमिक स्वयं भूखा रह जाता है।" यह कहानी सिर्फ एक खदान की नहीं, बल्कि उन हजारों हाथों की है जिन्होंने विकास की नींव तो रखी, लेकिन खुद उस इमारत से बेदखल कर दिए गए।

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