
नई दिल्ली. ब्रिक्स के विस्तार ने भारत के लिए न केवल आर्थिक बल्कि सामरिक लाभों के नए द्वार खोले हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, न्यू डेवलपमेंट बैंक और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने जैसी पहलें भारत को डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के दबाव से राहत दिला सकती हैं और उसकी आर्थिक संप्रभुता मजबूत कर सकती हैं।
सामरिक स्तर पर ब्रिक्स के नए सदस्य देशों का शामिल होना भारत की पहुंच को ऊर्जा संसाधनों, समुद्री मार्गों और रणनीतिक क्षेत्रों तक बढ़ाता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां चीन की प्रभावशीलता मजबूत रही है। इस मंच के जरिए भारत न केवल अपने हितों की रक्षा कर सकता है, बल्कि खुद को भरोसेमंद वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।
हालांकि, वैश्विक तनाव जैसे पश्चिम एशिया में संघर्ष, रूस-पश्चिम टकराव और अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सफलता की चुनौती बन रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि सम्मेलन संभवतः आयोजित होगा, जिसमें कुछ नेता ऑनलाइन माध्यम से शामिल हो सकते हैं।
ब्रिक्स के भीतर मतभेद भी हैं—चीन और भारत के बीच सीमा विवाद, रूस और पश्चिम के बीच युद्ध—लेकिन साझा आर्थिक हित और वैश्विक संतुलन की जरूरत सदस्य देशों को एक मंच पर लाती है। भारत का दृष्टिकोण संवाद, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान पर आधारित है, जो इसे मध्यस्थ और वैश्विक शांति के प्रोत्साहक के रूप में प्रस्तुत करता है।
भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और डिजिटल, हरित ऊर्जा एवं बुनियादी ढांचे में पहल इसे केवल सदस्य ही नहीं, बल्कि दिशा तय करने वाली शक्ति बनाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रिक्स का प्रभावी उपयोग कर भारत वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है और एक नई बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था के निर्माण में केंद्रीय भूमिका अदा कर सकता है।
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