
डिंडौरी जिले में स्थित समृद्ध और घने साल (सखुआ) के जंगलों पर एक बार फिर विनाशकारी 'साल बोरर' (Hoplocerambyx spinicornis) कीट का भीषण प्रकोप टूट पड़ा है। स्वस्थ पेड़ों को इस घातक कीट के संक्रमण से बचाने के लिए वन विभाग ने जिले के आठ विशेष संग्रहण केंद्रों पर गुरुवार दोपहर करीब 19 लाख 50 हजार कीड़ों को आग के हवाले कर नष्ट कर दिया। ग्रामीणों द्वारा एकत्र किए गए इन कीड़ों की मालाएं बनाकर लकड़ियों के बीच रखकर विधिवत पंचनामा तैयार करने के बाद जलाया गया। अकेले करंजिया संग्रहण केंद्र पर ही करीब 3 लाख 50 हजार कीड़े भस्म किए गए।
डीएफओ (DFO) अशोक कुमार सोलंकी ने बताया कि मानसून की पहली बारिश यानी 10 जून के आसपास यह कीट पेड़ों के तनों से बाहर निकलकर स्वस्थ साल के वृक्षों में अंडे देता है। इन अंडों से निकलने वाले लार्वा पेड़ के भीतर घुसकर उसे अंदर ही अंदर छलनी कर देते हैं, जिससे विशालकाय हरे-भरे पेड़ सूखकर खोखले हो जाते हैं। वन विभाग ने कबीर गांव, जगतपुर, चौरादादर, करंजिया, खारी डीह, गोपालपुर, गौरा कन्हारी और ठाड़ पत्थरा में पंचनामे की मौजूदगी में इन कीटों को नष्ट करने की कार्रवाई की।
विशेषज्ञों के मुताबिक, साल बोरर का एक प्राकृतिक संक्रमण चक्र लगभग 30 वर्ष का होता है। इससे पूर्व वर्ष 1997-98 में अविभाजित मध्य प्रदेश के मंडला-डिंडौरी क्षेत्र में इसका ऐतिहासिक प्रकोप देखा गया था, जब 1.42 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले 22.15 लाख पेड़ों को काटना पड़ा था और करीब 1.39 करोड़ कीट मारे गए थे। ठीक तीन दशक बाद वर्ष 2026-27 में यह संकट फिर उसी भयावह रूप में लौट आया है।
जिले के कबीर वन परिक्षेत्र में, जो अमरकंटक (नर्मदा उद्गम) से महज पांच किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ सीमा पर स्थित है, पेड़ों की कटाई का काम तेज गति से शुरू हो चुका है। वन रक्षक बिरजू सिंह परस्ते और दैनिक मजदूरों के अनुसार, पहले चरण में 4 हजार से अधिक चिन्हित पेड़ों को काटा जा रहा है। कुल्हाड़ी का वार पड़ते ही तनों से भारी मात्रा में लकड़ी का बुरादा और जिंदा कीड़े गिर रहे हैं। पूरे जिले में करीब डेढ़ लाख से अधिक पेड़ों पर लाल निशान लगाए जा चुके हैं, जिन्हें दिसंबर तक काटा जाना प्रस्तावित है।
सामान्य वन मंडल के एसडीओ सुरेंद्र जाटव ने बताया कि संक्रमण की रोकथाम के लिए 10 जून से 31 जुलाई के बीच सघन 'ऑपरेशन ट्रैप ट्री' अभियान चलाया गया था। इसमें साल के कटे हुए तनों के रस से कीटों को आकर्षित कर पकड़ा गया।
स्थानीय ग्रामीणों और बैगा आदिवासियों ने जंगलों से कुल 19 लाख 25 हजार 118 कीड़े पकड़कर केंद्रों पर जमा कराए। इसके एवज में ग्रामीणों को लगभग 40 लाख रुपये की मजदूरी का भुगतान किया जा रहा है, जिसमें से 50 फीसदी राशि का वितरण प्रत्यक्ष तौर पर किया जा चुका है। हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों में इस बात का गहरा मलाल है कि जिन पेड़ों की छांव में वे पले-बढ़े और जिनके गोंद व जड़ी-बूटियों से उनकी पीढ़ियां आजीविका चलाती थीं, आज आजीविका और पेट के लिए उन्हीं पर कुल्हाड़ी चलानी पड़ रही है।
जबलपुर स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान (SFRI) और TFRI के वैज्ञानिकों के अनुसार, डिंडौरी जिले का 40.45% भूभाग वनाच्छादित है, जिसमें 80,263 हेक्टेयर में सघन व विरल साल वन फैले हैं। यह संक्रमण अब डिंडौरी व अमरकंटक से लेकर छत्तीसगढ़ के चिल्पी, गरियाबंद और नारायणपुर तक फैल चुका है।
आर्थिक नुकसान: एक स्वस्थ साल वृक्ष से 2 से 3 घनमीटर उच्च गुणवत्ता वाली इमारती लकड़ी (कीमत ₹90,000 प्रति घनमीटर) मिलती है, लेकिन बोरर से प्रभावित लकड़ी का भाव गिरकर ₹35,000 से ₹40,000 प्रति घनमीटर रह जाता है। कटाई से करीब 46,390 घनमीटर इमारती और 43,940 घनमीटर जलाऊ लकड़ी निकलेगी, जिसकी ई-नीलामी से करीब 1600 से 1700 करोड़ रुपये का राजस्व मिलने का अनुमान है।
वैज्ञानिक चेतावनी: एसएफआरआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सी. मोहन के अनुसार, पिछले साल अत्यधिक मानसूनी बारिश और 80% से अधिक आर्द्रता (ह्यूमिडिटी) व 25-28 डिग्री तापमान के कारण बोरर कीट का प्रजनन अनियंत्रित हो गया। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पेड़ों को काटना स्थायी समाधान नहीं है; यदि समय रहते लंबी अवधि की जैविक व वैज्ञानिक माइक्रो-प्लानिंग नहीं की गई, तो नर्मदा के कैचमेंट क्षेत्र का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह तबाह हो जाएगा और काटे गए जंगलों को दोबारा पनपने में 30 साल से अधिक का समय लगेगा।
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