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भिंड में बकरी पालन योजना में 9.60 लाख का गबन, बैंक मैनेजर और लिपिक पर FIR दर्ज


भिंड जिले से भ्रष्टाचार का एक बड़ा मामला सामने आया है। यहां पशुपालन एवं डेयरी विभाग की 'बकरी पालन योजना' में 9.60 लाख रुपये से अधिक की राशि के गबन का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। इस मामले में पुलिस ने विभाग के एक लिपिक (क्लर्क), जिला सहकारी बैंक के शाखा प्रबंधक (ब्रांच मैनेजर) और कुछ अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना (फर्जी दस्तावेज तैयार करना) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर लिया है।

जांच में खुली पोल: सभी 22 आवेदन निकले पूरी तरह फर्जी

देहात थाना प्रभारी मुकेश शाक्य ने बताया कि मामले की शिकायत पशुपालन एवं डेयरी विभाग के जिला नोडल अधिकारी डॉ. स्वदेश थापक द्वारा दर्ज कराई गई है। दरअसल, भिंड कलेक्टर के निर्देश पर जिला पंचायत सीईओ वीरसिंह चौहान की अध्यक्षता में एक विशेष जांच समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने वर्ष 2025-26 की बकरी इकाई (101) योजना के तहत आए आवेदनों की बारीकी से जांच की। जांच में सामने आया कि अटेर विकासखंड (ब्लॉक) से आए सभी 22 आवेदन पूरी तरह से फर्जी और कूटरचित थे। यही नहीं, योजना के तहत ऋण (लोन) स्वीकृति के लिए यूको बैंक को भेजे जाने वाले पत्रों की कोई वास्तविक पावती (अकनॉलेजमेंट) भी नहीं कराई गई थी।

फर्जी दस्तावेजों के जरिए निजी खातों में ट्रांसफर की गई अनुदान राशि

जांच में यह भी पाया गया कि बैंक के नाम पर जारी किए गए ऋण स्वीकृति पत्र और अनुदान राशि मांग पत्र भी पूरी तरह जाली थे। इन्हीं फर्जी दस्तावेजों को असली बताते हुए पशुपालन विभाग से 9 लाख 60 हजार 460 रुपये की भारी-भरकम अनुदान राशि (सब्सिडी) स्वीकृत करा ली गई। नियमानुसार इस सरकारी राशि को यूको बैंक के मुख्य पूल खाते में भेजा जाना था, लेकिन आरोपियों ने फर्जी दस्तावेजों में चालाकी से दूसरे खाते नंबर अंकित कर दिए। यह खाता जिला सहकारी बैंक अटेर का था, जो यूको बैंक अटेर शाखा के माध्यम से संचालित हो रहा था।

फर्जी लेटर पैड और सील का खेल: आरोपियों ने इस घोटाले को अंजाम देने के लिए उप संचालक (डिप्टी डायरेक्टर) पशुपालन विभाग के नाम से फर्जी पत्र और सरकारी अभिलेख तैयार किए थे। इन फर्जी पत्रों को बैंक के रिकॉर्ड में लगाकर पूरी राशि को ठिकाने लगाया गया।

बैंक मैनेजर और लिपिक की मिलीभगत से हुआ घोटाला

इस पूरे घालमेल में अधिकारियों और बैंक प्रबंधन की सीधी मिलीभगत सामने आई है। जिला सहकारी बैंक अटेर के शाखा प्रबंधक देशराज नरवरिया ने नियमों को ताक पर रखकर इस सरकारी अनुदान राशि को योजना के वास्तविक लाभार्थियों (हितग्राहियों) को देने के बजाय अन्य बाहरी लोगों के निजी खातों में ट्रांसफर कर दिया और बाद में वह राशि निकलवा ली। वहीं, पशुपालन विभाग की योजना शाखा में पदस्थ सहायक ग्रेड-3 के लिपिक सुशील कुमार शाक्य ने इस पूरी साजिश की पृष्ठभूमि तैयार की। सुशील कुमार ने ही नियमों के विरुद्ध जाकर सभी 22 फर्जी आवेदन स्वयं प्राप्त किए थे और उनसे जुड़ा पूरा पत्राचार भी अपने स्तर पर ही संभाला था, ताकि किसी और को भनक न लग सके। फिलहाल पुलिस मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश और आगे की वैधानिक कार्रवाई में जुट गई है।

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