नई दिल्ली, 13 मार्च (आईएएनएस)। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई बदलाव आते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव मांसपेशियों और शारीरिक शक्ति में धीरे-धीरे आने वाली कमी है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिससे हर इंसान को गुजरना पड़ता है। आम तौर पर 20वें दशक में हमारी मांसपेशियां और शारीरिक ताकत अपने चरम पर होती हैं। इसके बाद 30 की उम्र पार करते-करते इसमें हल्की गिरावट शुरू हो जाती है। 40 के दशक के बाद यह गिरावट और तेज हो जाती है, जबकि 50 की उम्र के बाद मांसपेशियों और स्ट्रेंथ में कमी काफी तेजी से देखने को मिलती है।
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नई दिल्ली, 13 मार्च (आईएएनएस)। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई बदलाव आते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव मांसपेशियों और शारीरिक शक्ति में धीरे-धीरे आने वाली कमी है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिससे हर इंसान को गुजरना पड़ता है। आम तौर पर 20वें दशक में हमारी मांसपेशियां और शारीरिक ताकत अपने चरम पर होती हैं। इसके बाद 30 की उम्र पार करते-करते इसमें हल्की गिरावट शुरू हो जाती है। 40 के दशक के बाद यह गिरावट और तेज हो जाती है, जबकि 50 की उम्र के बाद मांसपेशियों और स्ट्रेंथ में कमी काफी तेजी से देखने को मिलती है।
असल में मानव शरीर की मांसपेशियां वास्तव में बहुत सूक्ष्म रेशों (मसल फाइबर) से बनी होती हैं। हर मांसपेशी के भीतर हजारों छोटे-छोटे फाइबर होते हैं। इन फाइबर के अंदर प्रोटीन से बने दो मुख्य ढांचे पाए जाते हैं- एक्टिन और मायोसिन। जब हमें कोई काम करना होता है, जैसे वजन उठाना या चलना, तब ये एक्टिन और मायोसिन एक-दूसरे के ऊपर फिसलते हैं और मांसपेशियां सिकुड़ती हैं। इसी सिकुड़न से बल पैदा होता है और हमारा शरीर कोई भी गतिविधि कर पाता है।
ये मानव शरीर किसी भी मशीन की तरह समय के साथ वियर एंड टीयर की प्रक्रिया से गुजरता है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में टूट-फूट और विघटन की यह प्रक्रिया स्वाभाविक है। जब उम्र के साथ मांसपेशियों और ताकत का नुकसान बहुत अधिक हो जाता है, तो इस स्थिति को सार्कोपेनिया कहा जाता है। इसके अलावा कुछ और कारण भी मांसपेशियों की कमजोरी में योगदान देते हैं, जैसे- हार्मोन में कमी (जैसे टेस्टोस्टेरोन और ग्रोथ हार्मोन), शारीरिक गतिविधि में कमी, प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा न लेना, नसों और मांसपेशियों के बीच कम होता समन्वय आदि। इन सब कारणों से मांसपेशियां धीरे-धीरे पतली और कमजोर होती जाती हैं।
हालांकि इस प्रक्रिया को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, क्योंकि यह प्रकृति का हिस्सा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि सही जीवनशैली, उचित पोषण और नियमित कसरत के जरिए इस प्रक्रिया को काफी हद तक धीमा जरूर किया जा सकता है।
यही कारण है कि अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या एंटी एजिंग जैसी कोई कसरत होती है?
इस सवाल का जवाब है- हां। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ये कसरत आपको फिर से जवान बना देंगी या आपकी उम्र घटा देंगी। असल में एंटी एजिंग कसरत का मतलब यह है कि वे आपकी उम्र बढ़ने के साथ होने वाली मांसपेशियों और स्ट्रेंथ की तेज गिरावट को कम करने में मदद करती हैं।
मान लीजिए कोई व्यक्ति कसरत नहीं करता और उचित पोषण भी नहीं लेता। ऐसे में उसके शरीर में मांसपेशियों का नुकसान काफी तेजी से होगा। इस असामान्य मसल्स लॉस को रोकने और शरीर को फिर से सामान्य स्थिति में लाने के लिए कुछ विशेष कसरत बेहद लाभदायक साबित होती हैं। ये कसरतें न केवल मांसपेशियों के नुकसान को रोकती हैं, बल्कि नई मांसपेशियां बनाने और ताकत बढ़ाने में भी मदद करती हैं। इस तरह आपकी मांसपेशियां और स्ट्रेंथ आपकी उम्र के अनुसार बेहतर बनी रह सकती हैं। इसी अर्थ में इन्हें एंटी एजिंग कसरत कहा जा सकता है।
अब जानते हैं ऐसी कुछ महत्वपूर्ण कसरतों के बारे में, जो बढ़ती उम्र में भी शरीर को मजबूत बनाए रखने में मदद करती हैं। लेकिन इससे पहले समझते हैं कि स्ट्रेंथ क्या है।
स्ट्रेंथ का अर्थ केवल बड़ी मांसपेशियां होना नहीं है। वैज्ञानिक रूप से स्ट्रेंथ उस क्षमता को कहते हैं, जिसमें मांसपेशियां किसी बल के खिलाफ काम करती हैं। दूसरे शब्दों में, जब हमारी मांसपेशियां सिकुड़ती हैं और किसी वस्तु को उठाने, धकेलने या शरीर को हिलाने के लिए बल पैदा करती हैं, उसी को स्ट्रेंथ कहा जाता है। यह दो चीजों पर निर्भर करती है- पहला, मांसपेशियों का आकार और घनत्व कितना है। दूसरा, मस्तिष्क और मांसपेशियों के बीच समन्वय कितना अच्छा है, जिससे मसल्स-माइंड कॉर्डिनेशन भी कह देते हैं।
जब हम स्ट्रेंथ ट्रेनिंग या रेजिस्टेंस एक्सरसाइज करते हैं, तो मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इस दबाव के कारण मांसपेशियों के फाइबर में बहुत सूक्ष्म स्तर पर हल्की-हल्की टूट-फूट (माइक्रो टियर) होती है। शरीर इस नुकसान को ठीक करने के लिए मरम्मत की प्रक्रिया शुरू करता है। इस मरम्मत के दौरान शरीर नई प्रोटीन संरचनाएं बनाता है और मांसपेशियों के फाइबर पहले से थोड़े मोटे और मजबूत हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को मसल हाइपरट्रॉफी कहा जाता है। यही कारण है कि नियमित कसरत करने वाले लोगों की मांसपेशियां अधिक मजबूत और घनी होती हैं।
इसलिए, इन एंटी एजिंग एक्सरसाइज से मांसपेशियों का आकार बढ़ने के साथ-साथ नसों और मांसपेशियों के बीच तालमेल भी बेहतर होता है। इसी वजह से व्यक्ति की ताकत बढ़ती है।
सबसे पहले बात करते हैं स्क्वाट की। यह कसरत पैरों की सबसे बड़ी मांसपेशियों- क्वाड्रीसेप्स, ग्लूट्स और हैमस्ट्रिंग पर काम करती है। ये वही मांसपेशियां हैं जो हमें चलने, उठने, सीढ़ियां चढ़ने और कुर्सी से उठने-बैठने जैसे रोजमर्रा के कामों में मदद करती हैं। स्क्वाट करते समय पीठ और कोर की मांसपेशियां भी सक्रिय होती हैं। इससे शरीर को स्थिरता और मजबूती दोनों मिलती हैं, जिससे झुकने या वजन उठाने जैसे काम भी आसानी से किए जा सकते हैं।
कोर मांसपेशियों को सक्रिय रखने के लिए क्रंच कसरत भी काफी उपयोगी है। कोर हमारे शरीर की बेहद महत्वपूर्ण मांसपेशियों का समूह है, जो पेट के आवरण के नीचे स्थित होता है और रीढ़ की हड्डी को स्थिरता प्रदान करता है। मजबूत कोर से कमर दर्द की समस्या भी कम होती है। आमतौर पर लोग पेट की मांसपेशियों में केवल रेक्टस एब्डोमिनिस यानी सिक्स पैक एब्स पर ध्यान देते हैं, लेकिन कोर कसरत शरीर की गहरी मांसपेशियों को सक्रिय करती है और समग्र पोश्चर को बेहतर बनाने में मदद करती है।
इसके अलावा लंज्स कसरत भी बेहद फायदेमंद मानी जाती है। खासकर रिवर्स लंज्स करने से पैरों की मांसपेशियों के साथ-साथ पेट और पीठ की मांसपेशियां भी सक्रिय होती हैं। यह कसरत शरीर की मोबिलिटी को बढ़ाने में भी मदद करती है। नियमित रूप से लंज्स करने से कूल्हों और घुटनों के जोड़ मजबूत बने रहते हैं। साथ ही, मांसपेशियों का घनत्व बेहतर होता है और खोई हुई ताकत धीरे-धीरे वापस आने लगती है।
अब बात करते हैं शरीर के ऊपरी हिस्से की मांसपेशियों की। इसके लिए पुश अप्स एक बेहतरीन कसरत मानी जाती है। पुश अप्स करने से कंधों, गर्दन, भुजाओं, छाती, पीठ और कोर की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं। इससे शरीर की उठाने, ले जाने और धक्का देने की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
बढ़ती उम्र में कई लोगों को बिस्तर से उठने, कुर्सी से खड़े होने, चलने या सीढ़ियां चढ़ने में कठिनाई होने लगती है। ऐसी स्थिति में उन मांसपेशियों को मजबूत बनाना बेहद जरूरी हो जाता है, जो इन गतिविधियों में काम आती हैं। इसके लिए ग्लूट ब्रिज या ब्रिजिंग कसरत काफी प्रभावी होती है। यह कसरत पीठ के निचले हिस्से और कूल्हों की मांसपेशियों को सक्रिय करती है, जिससे शरीर की स्थिरता और ताकत दोनों बढ़ती हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो बढ़ती उम्र में कसरत केवल फिट रहने का जरिया नहीं है, बल्कि यह शरीर की कार्यक्षमता को लंबे समय तक बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण साधन है। सही कसरत, संतुलित आहार और सक्रिय जीवनशैली अपनाकर मांसपेशियों और ताकत में होने वाली गिरावट को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है। यही आदतें हमें उम्र के साथ भी मजबूत, सक्रिय और आत्मनिर्भर बनाए रखने में मदद करती हैं।
--आईएएनएस
एएस/
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