
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय की नौ जजों वाली ऐतिहासिक संविधान पीठ इस समय धार्मिक अधिकारों और संवैधानिक मर्यादाओं के बीच संतुलन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी विमर्श कर रही है। इस सुनवाई का केंद्र केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का विवाद और दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित 'बहिष्कार' (एक्सकम्युनिकेशन) की प्रथा है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली यह पीठ इस पर विचार कर रही है कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है।
सुनवाई के दौरान धार्मिक परंपराओं में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा को लेकर पीठ के भीतर गंभीर टिप्पणियां देखने को मिलीं। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने आगाह किया कि यदि हर रीति-रिवाज को अदालत में चुनौती दी जाने लगी, तो इससे भारतीय सभ्यता की विविधता वाली संरचना प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने कहा कि "मंदिर खुलने और बंद होने" जैसे विषयों पर भी याचिकाएं आने लगेंगी। वहीं, न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश ने टिप्पणी की कि हर धार्मिक विवाद को अदालत लाने से "हर धर्म टूट जाएगा", क्योंकि एक के लिए जो आस्था है, वह दूसरे को गलत लग सकती है।
दूसरी ओर, बदलाव के पक्षधर दाऊदी बोहरा समूह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि संविधान के खिलाफ किसी भी प्रथा को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई धार्मिक प्रथा अनुच्छेद 25 और 26 की आड़ में किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का गंभीर हनन करती है, तो उसे संवैधानिक संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। 1962 के पुराने फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की सभ्यता अब पूर्णतः संविधान पर आधारित है।
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