
इंदौर। मध्य-पूर्व में जारी इज़राइल-ईरान संघर्ष का असर अब भारत के दवा उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। कच्चे माल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी, शिपिंग में देरी, कंटेनरों की कमी और बढ़े हुए माल भाड़े के कारण दवा कंपनियों की लागत लगातार बढ़ रही है।
इस स्थिति को देखते हुए दवा उद्योग ने सरकार और National Pharmaceutical Pricing Authority से मांग की है कि विशेष परिस्थितियों में Drugs (Prices Control) Order 2013 के नियमों से अस्थायी राहत दी जाए, ताकि कंपनियों को दवाओं की कीमतों में सीमित बढ़ोतरी की अनुमति मिल सके।
दरअसल देश में दवाओं की कीमतें एनपीपीए के जरिए नियंत्रित की जाती हैं। दवा निर्माताओं का कहना है कि कच्चे माल की लागत बढ़ने से उत्पादन खर्च काफी बढ़ गया है। Indian Drug Manufacturers Association के उपाध्यक्ष अजय सिंह दसौंदी के अनुसार पेट्रोकेमिकल्स से बनने वाले फार्मास्युटिकल सॉल्वेंट्स का उपयोग दवा निर्माण में होता है और इनके दाम एक सप्ताह में करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं।
उद्योग के मुताबिक कुछ कच्चे माल की कीमतों में 60 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। उदाहरण के तौर पर ग्लिसरीन की कीमत दिसंबर से अब तक करीब 64 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है, जबकि Paracetamol के दाम लगभग 26 प्रतिशत बढ़े हैं। इसके अलावा शिपिंग में देरी, कंटेनरों की कमी और बढ़े हुए फ्रेट चार्ज से भी लागत पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।
दवा उद्योग के प्रतिनिधियों ने बताया कि कंपनियां आमतौर पर ‘जस्ट-इन-टाइम’ इन्वेंटरी सिस्टम पर काम करती हैं, जिसके कारण बहुत अधिक स्टॉक नहीं रखा जाता। यदि युद्ध की स्थिति 10 से 15 दिनों तक और बनी रहती है तो आवश्यक दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
भारत सस्ती जेनेरिक दवाओं का प्रमुख निर्यातक है और United Arab Emirates, Saudi Arabia और ओमान जैसे देशों में भारतीय दवाओं की बड़ी मांग है। ऐसे में उत्पादन लागत बढ़ने का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी पड़ सकता है।
उद्योग ने यह भी सुझाव दिया है कि एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API), फार्मास्युटिकल सॉल्वेंट्स और पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में 30 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी को देखते हुए सरकार छोटे और मध्यम फार्मा निर्यातकों को बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत से राहत देने के लिए फ्रेट सब्सिडी देने पर भी विचार करे।

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