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अंतरिक्ष में भारत-रूस की नई छलांग: सेमी-क्रायोजेनिक इंजन के लिए ISRO और Roscosmos के बीच होगा समझौता


नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अपने भारी रॉकेटों की ताकत बढ़ाने के लिए रूस के साथ एक बड़े रक्षा और अंतरिक्ष समझौते की दहलीज पर है। इसरो की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, मॉस्को में सेमी-क्रायोजेनिक इंजन की आपूर्ति को लेकर तकनीकी चर्चा पूरी हो चुकी है और 'ड्राफ्ट कॉन्ट्रैक्ट' अब अंतिम मंजूरी के चरण में है। यह सहयोग भारत को 'हैवी-लिफ्ट' लॉन्च व्हीकल्स की श्रेणी में दुनिया के अग्रणी देशों के समकक्ष खड़ा कर देगा।

सेमी-क्रायोजेनिक तकनीक: क्यों है यह 'गेम-चेंजर'?

सेमी-क्रायोजेनिक इंजन पारंपरिक लिक्विड इंजन की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली और कुशल होते हैं। यह इंजन केरोसीन (Refined Kerosene) और लिक्विड ऑक्सीजन (LOX) के मिश्रण पर काम करता है।

  • नॉन-टॉक्सिक प्रोपेलेंट: इसमें इस्तेमाल होने वाला ईंधन सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल है।

  • अधिक थ्रस्ट: यह इंजन रॉकेट को शुरुआती उड़ान के दौरान जबरदस्त धक्का (Thrust) प्रदान करता है, जो भारी उपग्रहों को ले जाने के लिए आवश्यक है।

  • पेलोड क्षमता में वृद्धि: इसके इस्तेमाल से भारत के सबसे शक्तिशाली रॉकेट LVM3 की पेलोड क्षमता 4 टन से बढ़कर 6 टन तक पहुंच सकती है।

स्वदेशी प्रयास और रूसी सहयोग का तालमेल

भारत अपने स्वदेशी SE2000 इंजन पर पहले से ही काम कर रहा है, जिसका मार्च 2025 में महेंद्रगिरि में सफल 'हॉट टेस्ट' किया जा चुका है। रूस के साथ इस समझौते का उद्देश्य इस जटिल तकनीक के विकास में आने वाली चुनौतियों को कम करना और इसे जल्द से जल्द क्रियान्वित करना है। यह इंजन 'ऑक्सीडाइजर-रिच स्टेज्ड कंबशन साइकिल' जैसी जटिल तकनीक पर आधारित है, जो वर्तमान में केवल मुट्ठी भर देशों के पास है।

वीनस मिशन और अन्य वैश्विक साझेदारियां

इसरो की रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि रूस न केवल इंजन तकनीक में, बल्कि भारत के आगामी वीनस ऑर्बिटर मिशन (शुक्रयान) में भी पेलोड पार्टनर के रूप में शामिल होगा। इसके अलावा, भारत मानव अंतरिक्ष उड़ान (गगनयान), सैटेलाइट नेविगेशन और पृथ्वी अवलोकन जैसे क्षेत्रों में भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ा रहा है। रूस के साथ यह साझेदारी भारत की डीप स्पेस मिशनों (Deep Space Missions) और चंद्रमा व मंगल की ओर भारी पेलोड भेजने की क्षमता को नई दिशा देगी।

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