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लुहांस्क पूरी तरह रूस के कब्जे में? यूक्रेन ने खारिज किया दावा

रूस. दुनिया की नजरें जहां एक ओर ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव पर टिकी हैं, वहीं दूसरी ओर रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध लगातार और खतरनाक होता जा रहा है। इस बीच रूस ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि उसकी सेना ने पूर्वी यूक्रेन के लुहांस्क क्षेत्र पर पूरी तरह कब्जा कर लिया है। हालांकि यूक्रेन ने इस दावे की पुष्टि नहीं की है, जिससे जमीनी स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

रूस के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, पश्चिमी सैन्य समूह की इकाइयों ने लुहांस्क को “मुक्त” करा लिया है। यह वही इलाका है, जिस पर 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद से रूस की नजर थी। इसके साथ ही रूस ने खारकीव और जापोरिजिया क्षेत्र के कुछ गांवों पर भी कब्जे का दावा किया है। लुहांस्क और दोनेत्स्क मिलकर डोनबास क्षेत्र बनाते हैं, जो इस युद्ध का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है।

रूस ने यूक्रेन पर दबाव बढ़ाते हुए डोनबास से सेना हटाने की मांग की है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा कि यह कदम पहले ही उठाया जाना चाहिए था। वहीं यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने इस मांग को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि रूस का यह सोचना गलत है कि वह कम समय में पूरे डोनबास पर कब्जा कर सकता है।

जमीनी हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। रूस ने हाल ही में सैकड़ों ड्रोन से हमला किया, जिसमें खेरसोन क्षेत्र में दो महिलाओं की मौत हो गई और लुत्स्क में एक गोदाम में आग लग गई। यूक्रेन ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए रूस के उस्त-लुगा बंदरगाह पर ड्रोन हमला किया, जिससे तेल निर्यात प्रभावित होने की आशंका है। इसके अलावा ड्रोन के मलबे एस्टोनिया, फिनलैंड और लातविया में मिलने से पूरे यूरोप में चिंता बढ़ गई है।

इस युद्ध का दायरा अब और बढ़ गया है, क्योंकि उत्तर कोरिया भी खुलकर रूस के समर्थन में आ गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, हजारों उत्तर कोरियाई सैनिक रूस की मदद के लिए भेजे गए हैं, जिनमें से कई मारे जा चुके हैं। बदले में रूस उसे आर्थिक और सैन्य सहायता दे रहा है।

युद्ध के बीच रूस अपने देश में भी सख्ती बढ़ा रहा है। सरकार वीपीएन सेवाओं को बंद करने और डेटा नियंत्रण को मजबूत करने की तैयारी कर रही है। वहीं यूरोप के देश यूक्रेन के समर्थन में आगे आ रहे हैं, जिसमें रोमानिया के साथ मिलकर ड्रोन उत्पादन परियोजना शुरू की जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष अब केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की लड़ाई बन चुका है। हर दिन नए मोर्चे खुल रहे हैं और नए देश इसमें शामिल हो रहे हैं, जिससे शांति की उम्मीद लगातार कमजोर होती जा रही है।

 
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