
भोपाल. मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में आदिवासी बच्चों की अकाल मौतों और बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दिपके ने प्रभावित गांवों का दौरा करने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक बेहद तीखा और तंज कसने वाला पत्र पोस्ट किया है. इस पत्र में उन्होंने खुद को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बताते हुए अपने पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देने की घोषणा की है.
राज्यपाल को संबोधित और पीएम मोदी को किया टैग
मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगूभाई पटेल को संबोधित यह पत्र 13 अगस्त 2026 की तारीख से जारी किया गया है. अभिजीत दिपके के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से अंग्रेजी में किए गए इस पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी टैग किया गया है. पत्र में लिखा गया है— 'मैं तत्काल प्रभाव से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देता हूं. मैं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने मुझे राज्य की सेवा करने का मौका दिया, एक ऐसा मौका जिसमें मैं साफ तौर पर नाकाम रहा हूं.'
बालाघाट में बच्चों की मौत और विफलता का जिक्र
अपने इस व्यंग्यात्मक पत्र में दिपके ने बालाघाट में हुई 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौतों का कड़ा संदर्भ दिया है. उन्होंने लिखा है कि इन बच्चों की मौत के बाद उनका विवेक उन्हें इस पद पर एक पल भी बने रहने की अनुमति नहीं देता. मुख्यमंत्री की हैसियत से वे इन बच्चों को समय पर आवश्यक चिकित्सा और स्वास्थ्य देखभाल उपलब्ध कराने में पूरी तरह विफल रहे हैं. उन्होंने स्वीकार किया कि यदि त्वरित कदम उठाए जाते तो कई बच्चों की जान बचाई जा सकती थी और इस प्रशासनिक विफलता की नैतिक जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता.
मुआवजे की राशि और सिस्टम पर तीखे सवाल
पत्र में सरकार द्वारा घोषित मुआवजे की राशि पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं. दिपके ने लिखा है कि शुरुआत में प्रत्येक मृत बच्चे के परिवार के लिए केवल 2 लाख रुपये मुआवजे का ऐलान किया गया था, जिसे स्थानीय आदिवासी समुदाय के कड़े विरोध के बाद बढ़ाकर 4 लाख रुपये किया गया. उन्होंने कटाक्ष करते हुए पूछा कि यदि ये बच्चे किसी मंत्री या विधायक के होते, तो क्या 4 लाख रुपये का मुआवजा पर्याप्त माना जाता? सरकार की यह प्रतिक्रिया आदिवासी बच्चों के जीवन के प्रति उसकी गंभीरता को दर्शाती है.
पेयजल संकट और बदहाल स्कूलों का मुद्दा
इसके अलावा, पत्र में ग्रामीण क्षेत्रों के बुनियादी ढांचे की पोल खोली गई है. दिपके ने उल्लेख किया है कि केंद्र सरकार द्वारा ‘हर घर नल योजना’ को सफल घोषित किए जाने के बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि बालाघाट के कई हिस्सों में आज भी आदिवासी परिवार पीने के लिए दूषित नदी के पानी पर निर्भर हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर निरंतर खतरा मंडरा रहा है.
साथ ही, कई गांवों में स्कूलों की स्थिति पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि वहां के विद्यालय पशु आश्रयों से भी बदतर हैं, जहां आंगनबाड़ी से लेकर कक्षा 5 तक के लगभग 75 बच्चे एक ही कमरे में पढ़ाई करने को मजबूर हैं. स्थानीय आदिवासियों द्वारा बार-बार गुहार लगाने के बावजूद प्रशासन ने उचित स्कूल भवन उपलब्ध कराने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है.
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