
रामनगर। नगर परिषद रामनगर अंतर्गत कार्यरत कर्मचारी विगत 7-8 महीनों से मानदेय/पारिश्रमिक से वंचित हैं। वेतन न मिलने से कर्मचारियों में भारी मायूसी है और उनके घर-परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
आउटसोर्स नीति बनी मुसीबत -
सत्ताधारी सरकार की आउटसोर्स नीति के चलते नगर परिषद को ठेकेदार के हवाले कर दिया गया है। तथाकथित विकास कार्य कागजों पर चल रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
सफाई व्यवस्था का बुरा हाल -
आलम यह है कि ठेकेदार की लेबर द्वारा न तो प्रॉपर तरीके से सफाई कार्य किया जा रहा है और न ही अन्य कार्य। जिसके चलते -
- नगर में जगह-जगह कचरे के ढेर लगना आम हो गया है।
- मुहल्लों में कचरा कलेक्शन का काम बंद पड़ा है।
- बस मुख्य मार्ग से कचरा वाहन घूमकर औपचारिकता पूरी कर वापस चला जाता है।
कार्यालयीन काम ठप, कर्मचारी मजदूरी को मजबूर -
पारिश्रमिक न मिलने से अधिकांश कर्मचारी नगर परिषद का काम छोड़कर अन्यत्र मजदूरी करने को मजबूर हैं, जिससे नगरीय निकाय का कार्यालयीन काम भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
प्रभारी CMO की गैर-जिम्मेदारी,व जबाबदारी -
प्रभारी मुख्य नगर पालिका अधिकारियों की गैर-जिम्मेदारी के चलते न तो समय पर कार्यों का भुगतान हो पा रहा है और न ही संचालित कार्यों की मॉनिटरिंग हो रही है।
न जनप्रतिनिधि संवेदनशील, न विकास -
इस पूरे मामले पर न तो सांसद संवेदनशील हैं और न ही विधायक जी, जिसके चलते आम जनहित के कार्य और कर्मचारियों की स्थिति दोनों ही दयनीय बनी हुई है। वही सम्बन्धित विभाग के मंत्री को कोई फर्क ही नही पड़ रहा,नगर परिषद अध्यक्ष कांग्रेस पार्टी से हैं, जबकि प्रदेश में भाजपा की सरकार है, जिसके चलते नगर का विकास प्रभावित होना आम बात हो गई है।
कामों में राजनीति ज्यादा हावी होने से विगत पांच सालों से संचालित कोई भी योजना, परियोजना या विकास कार्य मूर्त रूप नहीं ले पाया है। कर्मचारियों ने शासन-प्रशासन से जल्द से जल्द 7-8 महीने का बकाया वेतन भुगतान करने और सफाई व्यवस्था दुरुस्त करने की मांग की है।
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