नई दिल्ली, 27 अक्टूबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के कामकाज और विभिन्न राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर राहुल गांधी सहित 13 विपक्षी नेताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई स्थगित कर दी है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग के हलफनामे पर 10 दिनों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। वहीं चुनाव आयोग के हलफनामे पर याचिकाकर्ता ने सवाल उठाए हैं कि अगर फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं हुआ तो चुनाव आयोग ने किस आधार पर राज्यों में चुनाव कराए?
![]()
नई दिल्ली, 27 अक्टूबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के कामकाज और विभिन्न राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर राहुल गांधी सहित 13 विपक्षी नेताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई स्थगित कर दी है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग के हलफनामे पर 10 दिनों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। वहीं चुनाव आयोग के हलफनामे पर याचिकाकर्ता ने सवाल उठाए हैं कि अगर फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं हुआ तो चुनाव आयोग ने किस आधार पर राज्यों में चुनाव कराए?
एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग के 248 पन्नों के हलफनामे पर जवाब देने के लिए 10 दिन का समय दिया है। टीएमसी नेता डोला सेन द्वारा भी एक अलग याचिका दायर की गई थी, उस मामले में भी नोटिस जारी किया गया है। अगली सुनवाई कोर्ट की छुट्टियों के बाद होगी।"
उन्होंने कहा कि रिजॉइंडर दाखिल करने के लिए दस दिन का समय दिया गया है। इस बीच यदि कोई और दस्तावेज दाखिल करने हैं या कुछ अतिरिक्त प्रस्तुत करना है, तो उसके लिए भी चुनाव आयोग को समय दिया गया है।
एडवोकेट शैलेंद्र मणि ने कहा कि संतोषजनक जवाब बिल्कुल नहीं है। याचिका में जो आरोप लगाए गए थे, प्रथम दृष्टया देखने पर यही लगता है कि उन्होंने उन्हें अनमने मन से स्वीकार किया है। उसी तरह जैसे किसी गलती को सीधे स्वीकार तो नहीं किया गया हो, लेकिन उसके संकेत अवश्य दिए गए हों। एक पैरा में उन्होंने लिखा है कि यदि कोई अधिकारी इस प्रकार के अवैध आचरण का दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। चुनाव आयोग की ओर से दाखिल जवाब में इस प्रकार का संकेत दिया गया है। साथ ही मुख्य जिम्मेदार व्यक्तियों जैसे ज्ञानेश कुमार, मनीष गर्ग और सीमा खन्ना को बचाने के लिए जवाब में भरपूर कोशिश की गई हैं।
याचिकाकर्ता के वकील नरेंद्र मिश्रा ने कहा कि जिस प्रकार चुनाव आयोग का कल रात जवाब आया, उसमें तीन मास्टर याचिकाएं थीं। एक प्रिया मिश्रा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया थी और दो अन्य याचिकाएं भी थीं, जिनके बारे में आप सब जानते हैं। जिस प्रकार उनका जवाब आया है, उसमें हमारी चार महत्वपूर्ण प्रार्थनाएं फॉर्म-6 को लेकर थीं। फॉर्म-6 के संबंध में उन्होंने पूरे देश को स्पष्ट कर दिया कि उसमें कोई संशोधन नहीं किया गया है। सवाल यह उठता है कि विभिन्न राज्यों में जो चुनाव कराए गए, वे किस आधार पर कराए गए? यदि फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं हुआ, तो उसमें क्या जोड़ा गया और क्या हटाया गया? क्या चुनाव आयोग के पास ऐसा करने की शक्ति थी या फिर यह शक्ति संसद के पास थी?
उन्होंने कहा कि हमारी एक और प्रार्थना धारा 16 और धारा 23 से संबंधित थी। जिस प्रकार का सुरक्षा कवच चुनाव आयुक्त को दिया गया है, उस पर भी प्रश्न है। चुनाव आयुक्त एक आईएएस अधिकारी होते हैं, जिनका पदोन्नयन होकर वे चुनाव आयुक्त के पद तक पहुंचते हैं। इसका अर्थ यह हो जाता है कि देश के अन्य आईएएस अधिकारियों के संदर्भ में भी इस प्रकार की व्याख्या की जा सकती है।
एडवोकेट नरेंद्र मिश्रा ने कहा कि इस मुद्दे पर चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया कि उन्हें हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान है। यदि किसी स्तर पर कोई गलती या अनियमितता पाई जाती है, तो फिर उनके विरुद्ध आपराधिक या दीवानी कार्रवाई कैसे की जा सकती है, जबकि धारा 16 उन्हें एक प्रकार का संरक्षण प्रदान करती है? सर्वोच्च न्यायालय के किसी निर्णय के विरुद्ध भी पुनर्विचार याचिका या क्यूरेटिव याचिका दायर की जा सकती है, लेकिन यहां एक व्यापक सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है। इससे यह प्रश्न उठता है कि यदि भविष्य में कोई त्रुटि होती है तो जवाबदेही किस प्रकार सुनिश्चित की जाएगी।
उन्होंने कहा कि तीसरा, एसआईआर से जुड़े 13 करोड़ मतदाताओं के अधिकारों का प्रश्न अब भी बना हुआ है। इन्हीं अधिकारों को लेकर सभी याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं। पहले जिन तीन मास्टर याचिकाओं पर नोटिस जारी हुआ था, उनके संबंध में जो जवाब आया है, उसे अन्य पक्षों को भी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
एडवोकेट नरेंद्र मिश्रा ने कहा कि न्यायालय ने यह भी कहा है कि इस विषय से जुड़े अन्य लंबित मामलों को भी नोटिस जारी किया जाए। अदालत ने संकेत दिया है कि अवकाश के बाद इस मामले को फिर सूचीबद्ध किया जाए। हालांकि, इसकी आधिकारिक स्थिति न्यायालय की सूची के अनुसार ही स्पष्ट होगी।
--आईएएनएस
केके/वीसी
Leave A Reviews