
शहडोल. मध्य प्रदेश सरकार हर साल करोड़ों का बजट पास कर 'स्कूल चलें हम' के बड़े-बड़े दावे और कागजों पर चमचमाती व्यवस्थाओं की तस्वीरें पेश करती है। लेकिन जैसे ही नया शैक्षणिक सत्र (Academic Session) शुरू होता है, जमीनी हकीकत इन दावों की धज्जियां उड़ा देती है। व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा मारती एक ऐसी ही हैरान और डराने वाली तस्वीर मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य शहडोल जिले से सामने आई है। यहाँ बुढार विकासखंड के अंतर्गत आने वाले शासकीय माध्यमिक विद्यालय, अतरिया में देश का भविष्य किसी सुरक्षित स्कूल भवन में नहीं, बल्कि एक खुले सांस्कृतिक रंगमंच और सामुदायिक भवन में मौत के साए के बीच ककहरा सीखने को मजबूर है।
अतरिया विद्यालय में कक्षा 1 से लेकर 8वीं तक के मासूम बच्चे पढ़ते हैं। कहने को यहाँ एक शासकीय स्कूल भवन है, लेकिन वह इतना जर्जर और कंडम हो चुका है कि कभी भी भरभरा कर गिर सकता है। हादसे के डर से शिक्षकों को बच्चों की कक्षाएं बाहर सामुदायिक भवन और खुले सांस्कृतिक मंच पर लगानी पड़ रही हैं।
सबसे खौफनाक और चिंताजनक बात यह है कि जिस बंद कमरे के भीतर मासूम बच्चे बैठकर पढ़ाई करते हैं, ठीक उसी कमरे में मिड-डे मील (मध्यान्ह भोजन) का खाना पकाने के लिए धधकते चूल्हे के साथ गैस सिलेंडर रखा जाता है। एक छोटा सा कमरा, दर्जनों मासूम बच्चे और वहीं पर जलती हुई आग—एक छोटी सी लापरवाही या गैस रिसाव किसी भी वक्त एक बड़े और भयावह हादसे को जन्म दे सकती है।
जो बच्चे सामुदायिक भवन के छोटे से कमरे में नहीं समा पाते, उन्हें बाहर बने खुले सांस्कृतिक मंच (रंगमंच) पर खुले आसमान के नीचे बिठाया जाता है। इस खुले मंच के ठीक बगल में एक गहरा और खुला हुआ कुआं मौजूद है, जिस पर कोई मुंडेर या जाली नहीं है। बच्चे आखिरकार बच्चे हैं; खेलते-कूदते या आधी छुट्टी (इंटरवल) के दौरान यदि किसी भी बच्चे का पैर फिसला, तो एक असहनीय हादसा होना तय है। अब मानसून की शुरुआत के साथ ही यहाँ फिसलन, जलभराव और खुले में पढ़ाई की समस्या बच्चों की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ाने वाली है।
जब इस बेहद गंभीर और खौफनाक जमीनी हकीकत को लेकर शहडोल के जिला परियोजना समन्वयक (DPC) से तीखे सवाल पूछे गए, तो उनके द्वारा पेश किए गए आंकड़े जिले की बदहाल शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ विहीन हकीकत को पूरी तरह बेनकाब कर देते हैं। डीपीसी के अनुसार:
जिले में 83 स्कूल भवन पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं, जो संचालन के बिल्कुल योग्य नहीं हैं।
646 जर्जर भवनों को तत्काल मरम्मत (रिपेयरिंग) की सख्त जरूरत है।
जिले के 10 स्कूल वर्तमान में निजी या किराये के भवनों में संचालित हो रहे हैं।
41 स्कूल भवनों में तत्काल सुधार कार्य की आवश्यकता है और 20 नए स्कूलों के निर्माण का प्रस्ताव डीएमएफ (DMF) मद में भेजा गया है।
अतरिया शासकीय विद्यालय की यह डरावनी तस्वीर केवल एक स्कूल की समस्या नहीं है, बल्कि यह आदिवासी अंचलों में शिक्षा विभाग की प्राथमिकताओं का असली आईना है। जिन बच्चों के हाथों में सुरक्षित भविष्य के सपने होने चाहिए, वे जनप्रतिनिधियों और आला अधिकारियों से सिर्फ एक सुरक्षित छत की गुहार लगा रहे हैं। अब देखना यह है कि कुंभकर्णी नींद में सोया जिम्मेदार विभाग कब जागता है और इन मासूमों को मौत के इस खेल से बाहर निकालकर एक सुरक्षित स्कूल भवन उपलब्ध कराता है।
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