
रामनगर (मैहर): बाणसागर परियोजना के डूब विस्थापितों के लिए बसाया गया 'आदर्श ग्राम न्यू-रामनगर' आज राजनीति और निजी स्वार्थ की भेंट चढ़ चुका है। विस्थापितों को सर्वसुविधा संपन्न आवास और भूखंड देने का वादा कर बसाए गए इस नगर में अब अतिक्रमण और भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। ताजा विवाद अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर है, जहां पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष और वर्तमान प्रशासन के बीच श्रेय और विरोध की राजनीति चल रही है।
न्यू-रामनगर के विस्थापन के समय टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के नियमों को ताक पर रखकर नक्शों में बदलाव किए गए। आरोप है कि सफेदपोश नेताओं और बाणसागर परियोजना के अधिकारियों की मिलीभगत से सार्वजनिक जमीनों, चरागाहों, मुक्तिधामों, नालों और पार्कों तक पर अपनों को भूखंड बांट दिए गए। विस्थापितों को 50x90 के बजाय 40x90 के छोटे भूखंड थमा दिए गए, जबकि कीमती जमीनों पर रसूखदारों ने कब्जा जमा लिया।

नगर परिषद के गठन के बाद राजस्व पट्टे दिए बिना ही जनता से तमाम कर वसूले जाने लगे, लेकिन विकास के नाम पर सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण का बोलबाला रहा। पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष और तत्कालीन मंत्रियों के संरक्षण में अवैध गोमतियां रखवाई गईं और अपनों को पीएम आवास के नाम पर सरकारी जमीनों पर काबिज कराया गया। अब स्थिति यह है कि जिन पूर्व अध्यक्ष ने खुद अतिक्रमण हटाने का प्रस्ताव पास किया था, वे ही अब राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर कार्रवाई को रुकवा रहे हैं और सारा ठीकरा वर्तमान परिषद पर फोड़ रहे हैं।
वर्तमान नगर परिषद ने सड़क किनारे की गोमतियों को वार्ड 3, 6, 7 और 14 में व्यवस्थित करने और अतिक्रमण हटाने की योजना बनाई थी। व्यवसायिक कॉम्प्लेक्स भी तैयार किए गए और नीलामी प्रक्रिया शुरू हुई। लेकिन सत्ताधारी रसूखदारों के हस्तक्षेप के कारण न तो दुकानों का आवंटन हो पा रहा है और न ही सड़क से कब्जा हट रहा है। नतीजा यह है कि:
करोड़ों की लागत से बने व्यवसायिक कॉम्प्लेक्स कबाड़ खाने में तब्दील हो रहे हैं।
सड़क, नाली और पेवमेंट निर्माण का कार्य पूरी तरह ठप है।
अवैध कब्जों के कारण सड़कों पर रोज जाम लग रहा है, जिससे आम जनता परेशान है।
सत्ता और रसूख के इस खेल में रामनगर का विकास 'जीरो' साबित हो रहा है, जबकि कागजों पर आदर्श ग्राम का दावा आज भी बरकरार है।
Leave A Reviews