
मुंबई. भारतीय सिनेमा की पहली 'प्लेबैक सिंगर' शमशाद बेगम की 107वीं जयंती के अवसर पर संगीत जगत उन्हें याद कर रहा है. एक दौर ऐसा था जब शमशाद बेगम की आवाज का जादू लाहौर से लेकर बॉम्बे तक सिर चढ़कर बोलता था. पिता की कड़ी पाबंदियों और बुर्के के साये में रहकर उन्होंने अपनी गायकी से उस मुकाम को छुआ, जहाँ पहुँचने का सपना हर कलाकार देखता है.
शमशाद बेगम के जीवन के अनछुए पहलू
12 साल की उम्र में जादुई ऑडिशन: दिग्गज संगीतकार गुलाम हैदर ने जब 12 साल की छोटी सी शमशाद को बहादुर शाह जफर की गजल गाते सुना, तो उन्होंने पहली दो लाइनें सुनते ही 12 गानों का कॉन्ट्रैक्ट साइन कर लिया था.
जब किशोर कुमार उठाते थे कुर्सी: शमशाद बेगम का रुतबा ऐसा था कि किशोर कुमार जैसा महान कलाकार भी उनके सम्मान में उनकी कुर्सी उठाकर पीछे चलता था. दिग्गज गायिका लता मंगेशकर और आशा भोंसले को उनके शुरुआती दिनों में संगीतकारों द्वारा शमशाद बेगम की शैली अपनाने की सलाह दी जाती थी.
सबसे महंगी सिंगर: जिस दौर में गायकों को एक गाने के 100 रुपये मिलते थे, शमशाद बेगम की लोकप्रियता इतनी थी कि फिल्ममेकर्स उन्हें 2000 रुपये फीस देने के लिए लाइन लगाते थे.
ताउम्र पर्दे में रहकर गायकी: अपने पिता को दिए वचन के कारण उन्होंने कभी कैमरे के सामने पोज नहीं दिया. अपनी जवानी के दिनों में उनकी कोई तस्वीर मौजूद नहीं है, क्योंकि उन्होंने हमेशा बुर्के और पर्दे में रहकर अपनी कला को जीवित रखा.
सदाबहार गानों की विरासत
उन्होंने अपने करियर में लगभग 6,000 गाने गाए. 'कजरा मोहब्बत वाला', 'सैंया दिल में आना रे', और 'ले के पहला पहला प्यार' जैसे उनके गाने आज भी रिमिक्स के जरिए नई पीढ़ी की जुबान पर हैं. फिल्म 'मुगल-ए-आजम' का गाना 'तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर' आज भी संगीत प्रेमियों के लिए एक मिसाल है.
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