
लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अदालत ने शुक्रवार को दोहरी नागरिकता से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि राहुल गांधी पर लगे आरोपों की जांच होनी चाहिए। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह स्वयं जांच करे या किसी केंद्रीय एजेंसी को मामला सौंपे। यह आदेश निचली अदालत के उस फैसले के खिलाफ आया है, जिसमें राहुल गांधी नागरिकता विवाद की शिकायत को पहले खारिज कर दिया गया था।
यह विवाद मूल रूप से रायबरेली की विशेष सांसद-विधायक (MP-MLA) अदालत में दायर किया गया था। याचिकाकर्ता एस. विग्नेश शिशिर की अर्जी पर हाईकोर्ट ने 17 दिसंबर, 2025 को इस केस को लखनऊ स्थानांतरित कर दिया था। हालांकि, 28 जनवरी, 2026 को लखनऊ की निचली अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि वह नागरिकता के मुद्दे पर फैसला लेने में सक्षम नहीं है। अब हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आरोपों की सत्यता जांच का विषय है और इसे टाला नहीं जा सकता।
कर्नाटक के भाजपा कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर ने यह याचिका दाखिल की है। याचिकाकर्ता ने राहुल गांधी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, पासपोर्ट एक्ट और विदेशी अधिनियम के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि राहुल गांधी के पास दोहरी नागरिकता से जुड़े साक्ष्य मौजूद हैं, जो कानूनी रूप से जांच के दायरे में आते हैं। राहुल गांधी नागरिकता विवाद में याचिकाकर्ता ने अब विस्तृत जांच के लिए हाईकोर्ट की शरण ली थी, जहाँ से उन्हें बड़ी राहत मिली है।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब गेंद सरकार के पाले में है। कोर्ट ने जांच के स्वरूप को लेकर विकल्प खुला रखा है। न्यायमूर्ति ने माना कि एक सार्वजनिक व्यक्ति पर लगे ऐसे आरोप राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकता कानूनों से जुड़े हैं। इसलिए प्राथमिक जांच आवश्यक है। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस पार्टी इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रही है, जबकि याचिकाकर्ता ने इसे कानून की जीत करार दिया है।
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