
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ती बाल तस्करी के मामलों पर गहरी चिंता जताते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चेतावनी दी है कि यदि उन्होंने तुरंत प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो हालात नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं। अदालत ने कहा कि कई राज्यों ने अब तक आवश्यक रिपोर्ट और समितियां नहीं बनाई हैं। मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को होगी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत निगरानी कर सकती है, लेकिन वास्तविक कार्रवाई राज्य सरकार, पुलिस और संबंधित एजेंसियों को करनी होगी। पीठ ने लापरवाह रवैये पर नाराजगी जताई और कहा कि बच्चों की बरामदगी से यह स्पष्ट है कि समस्या का समाधान संभव है, लेकिन इसके लिए राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल 2025 के अपने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उस निर्णय में संगठित तस्करी नेटवर्क को तोड़ने के लिए कई निर्देश दिए गए थे। इनमें छह महीने के भीतर ट्रायल पूरा करना, एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स (AHTUs) को मजबूत करना और जांच प्रक्रिया में सुधार शामिल था।
राज्यों को निर्देश दिए गए थे कि वे तस्करी के संभावित हॉटस्पॉट की पहचान और निगरानी के लिए राज्य स्तरीय समितियां बनाएं और लापता बच्चों के मामलों में तस्करी मानकर जांच शुरू करें। हालाँकि, कई राज्यों द्वारा दाखिल अनुपालन रिपोर्ट केवल औपचारिकता रही। सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि मध्य प्रदेश, गोवा, हरियाणा, लक्षद्वीप, मिजोरम, ओडिशा और पंजाब ने अभी तक तय प्रारूप में रिपोर्ट दाखिल नहीं की।
मध्य प्रदेश के गृह सचिव ने देरी पर माफी मांगी, जिस पर कोर्ट ने अंतिम मौका देते हुए चेतावनी दी कि आगे भी लापरवाही बरती गई तो संबंधित राज्यों को डिफॉल्टर घोषित किया जाएगा। कम से कम 15 राज्यों ने अब तक तस्करी प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी के लिए आवश्यक समितियां गठित नहीं की हैं।
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