
नई दिल्ली: उन्नाव दुष्कर्म मामले से जुड़ी कानूनी लड़ाई में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पीड़िता की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें पूर्व विधायक और मामले के मुख्य दोषी कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ कुछ अतिरिक्त साक्ष्य (एडिशनल एविडेंस) पेश करने की अनुमति मांगी गई थी। इस फैसले को कानूनी प्रक्रिया के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह सीधे तौर पर मामले के साक्ष्यों की स्वीकार्यता से जुड़ा है।
अतिरिक्त साक्ष्य की आवश्यकता नहीं: हाईकोर्ट न्यायमूर्ति प्रतिबा एम. सिंह और न्यायमूर्ति सुधा जैन की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों को देखते हुए अब किसी और सबूत की जरूरत नहीं है। अदालत ने विशेष रूप से स्कूल के एक पत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि दाखिले के समय जन्म प्रमाण पत्र जैसे किसी ठोस दस्तावेज के अभाव का संकेत मिलता है। पीठ ने साफ़ किया कि मामले की मौजूदा स्थिति में नए तथ्यों को जोड़ने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
उम्र निर्धारण और कानून की प्रक्रिया सुनवाई के दौरान पीड़िता की उम्र को लेकर भी विस्तार से चर्चा हुई। हाईकोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) की धारा 94 का उल्लेख किया, जो किसी नाबालिग की आयु निर्धारित करने के लिए मानक तय करती है। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि उम्र के आकलन के लिए कानूनी मानकों का पालन पहले ही किया जा चुका है, इसलिए इस विषय पर अब नए साक्ष्य लाने का कोई औचित्य नहीं है।
देरी पर अदालत का सख्त रुख इससे पहले, अप्रैल में हुई एक अन्य सुनवाई के दौरान जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने पीड़िता की उस अपील को भी ठुकरा दिया था, जिसमें सेंगर को मृत्युदंड (मौत की सजा) देने की मांग की गई थी। कोर्ट ने करीब 1945 दिनों की लंबी देरी पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि अगर याचिकाकर्ता अपने अधिकारों के प्रति सतर्क नहीं है, तो इतनी देरी के बाद राहत की मांग नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि इस विलंब के पीछे कोई ठोस कारण नहीं बताया गया।
फिलहाल, कुलदीप सिंह सेंगर उम्रकैद की सजा काट रहा है। हाईकोर्ट के इन कड़े फैसलों के बाद अब पीड़िता के पास सजा बढ़ाने या नए साक्ष्य पेश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है।
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