नई दिल्ली, 13 जून (आईएएनएस)। दिल्ली के उपहार सिनेमा अग्निकांड को 29 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन इस हादसे में अपनों को खोने वाले परिवारों का दर्द आज भी कम नहीं हुआ है। इस मौके पर उपहार त्रासदी पीड़ित संघ (एवीयूटी) की अध्यक्ष नीलम कृष्णमूर्ति और महासचिव शेखर कृष्णमूर्ति ने देश में अग्नि सुरक्षा व्यवस्था, न्याय प्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए।
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नई दिल्ली, 13 जून (आईएएनएस)। दिल्ली के उपहार सिनेमा अग्निकांड को 29 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन इस हादसे में अपनों को खोने वाले परिवारों का दर्द आज भी कम नहीं हुआ है। इस मौके पर उपहार त्रासदी पीड़ित संघ (एवीयूटी) की अध्यक्ष नीलम कृष्णमूर्ति और महासचिव शेखर कृष्णमूर्ति ने देश में अग्नि सुरक्षा व्यवस्था, न्याय प्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए।
नीलम कृष्णमूर्ति ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत करते हुए कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि 29 साल बीत जाने के बाद भी हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया है। अगर कुछ बदला है तो वह यह कि आज मानव जीवन की कीमत और भी सस्ती हो गई है। इस तरह की त्रासदियों के लिए केवल एक व्यक्ति या संस्था नहीं, बल्कि कई सरकारी विभाग जिम्मेदार होते हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह भ्रष्टाचार है।
उन्होंने कहा कि भारत में अग्नि सुरक्षा कानूनों और भवन निर्माण संबंधी नियमों की कोई कमी नहीं है। समस्या यह है कि इन नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया जाता है। कई बार भवन मालिक और संचालक पैसे बचाने के लिए सुरक्षा मानकों से समझौता कर लेते हैं, जिसका खामियाजा आम लोगों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है।
उपहार मामले में अंसल बंधुओं (सुशील और गोपाल अंसल) द्वारा दिल्ली सरकार को दिए गए 60 करोड़ रुपए का जिक्र करते हुए नीलम कृष्णमूर्ति ने कहा कि उनके अनुसार यह सजा नहीं, बल्कि एक तरह का इनाम था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में दिल्ली सरकार भी बराबर की जिम्मेदार थी, क्योंकि दिल्ली फायर सर्विस, डीवीबी, एमसीडी और पीडब्ल्यूडी के अधिकारी सरकार के ही कर्मचारी थे। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि यह राशि पीड़ितों के लिए एक ट्रॉमा सेंटर बनाने में खर्च की जाए। इसके तहत अंसल बंधुओं को ट्रॉमा सेंटर बनाना था, जबकि जमीन डीवीबी को उपलब्ध करानी थी।
नीलम कृष्णमूर्ति ने उठाते हुए कहा कि लोग कहते हैं कि न्याय मिल गया, लेकिन वास्तविकता यह है कि न्याय नहीं मिला। अदालत ने फैसला जरूर सुनाया, लेकिन फैसला सुनाना और न्याय देना दोनों अलग बातें हैं। इस देश में पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता, बल्कि वे बार-बार पीड़ित होते रहते हैं।
वहीं, एवीयूटी के महासचिव शेखर कृष्णमूर्ति ने कहा कि उपहार सिनेमा हादसे के बाद भी कुछ नहीं बदला। उन्होंने हाल ही में दिल्ली के मालवीय नगर में हुई आग की घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों मामलों में एक जैसी लापरवाही देखने को मिली। उन्होंने बताया कि दोनों जगहों पर केवल एक प्रवेश और निकास मार्ग था, जिससे लोग धुएं और दम घुटने के कारण फंस गए। कई लोगों की जान बचाने के लिए स्थानीय दुकानदारों को नीचे गद्दे बिछाने पड़े, ताकि ऊपर से कूदने वालों को बचाया जा सके।
उन्होंने कहा कि आज भी फायर ब्रिगेड अक्सर पर्याप्त पानी, सही उपकरणों और पर्याप्त कर्मचारियों के बिना घटनास्थल पर पहुंचती है। पिछले 30 वर्षों में कई बड़े हादसे हुए, लेकिन व्यवस्था में कोई बड़ा सुधार नहीं दिखाई देता।
शेखर कृष्णमूर्ति ने मांग की कि मानव निर्मित आपदाओं के लिए एक अलग और सख्त कानून बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में कम से कम 10 साल की सजा अनिवार्य होनी चाहिए, अपराध गैर-जमानती हों, और मुकदमों का निपटारा दो साल के भीतर समयबद्ध तरीके से किया जाए।
उन्होंने न्याय मिलने के दावों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि 59 लोगों की मौत के बाद भी परिवारों को इंसाफ का इंतजार करना पड़ा। वर्षों बाद अदालतों में यह कहा जाता है कि लोग बूढ़े हो गए हैं, लेकिन यह उम्र बढ़ना उनकी पसंद नहीं थी, बल्कि न्याय के इंतजार में पूरा जीवन बीत गया। उन्होंने पूछा कि बार-बार स्थगन कौन देता है और क्यों देता है। यदि इस पर रोक नहीं लगी तो ऐसे हादसे आगे भी होते रहेंगे।
13 जून 1997 को दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में फिल्म 'बॉर्डर' के तीन बजे वाले शो के दौरान भीषण आग लग गई थी। यह हादसा भारत के इतिहास की सबसे भयावह अग्नि त्रासदियों में से एक माना जाता है, जिसमें 59 लोगों की जान चली गई थी और सैकड़ों लोग प्रभावित हुए थे।
--आईएएनएस
वीकेयू/डीकेपी
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