
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस सूर्यकांत ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए न्यायिक सेवा परीक्षाओं से जुड़े अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए। जजों ने बताया कि आज शीर्ष अदालत के ऊंचे पदों पर बैठने के बावजूद, एक समय ऐसा भी था जब उन्हें भी असफलता का सामना करना पड़ा था। यह चर्चा तब शुरू हुई जब अदालत के सामने हरियाणा न्यायिक सेवा परीक्षा के अंकों के निर्धारण से संबंधित एक मामला आया।
जस्टिस सूर्यकांत ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने भी एक बार हरियाणा न्यायिक सेवा की परीक्षा दी थी, लेकिन वे उसमें सफल नहीं हो पाए थे। उन्होंने कहा कि उस असफलता के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और वकालत की राह चुनी, जिसके बाद वे पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के जज बने और आज सुप्रीम कोर्ट में हैं। उनकी इस बात ने कोर्ट रूम में मौजूद वकीलों और छात्रों को यह संदेश दिया कि एक परीक्षा में मिली हार करियर का अंत नहीं होती।
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने भी जस्टिस सूर्यकांत की बात का समर्थन करते हुए अपनी यादें साझा कीं। CJI ने बताया कि उन्होंने भी दिल्ली न्यायिक सेवा की परीक्षा दी थी, लेकिन उनका चयन नहीं हो पाया था। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि शायद उस समय चयन न होना ही बेहतर था, क्योंकि नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। इन शीर्ष न्यायाधीशों के अनुभवों ने यह स्पष्ट किया कि मेहनत और दृढ़ संकल्प से असफलता को भी सफलता की सीढ़ी बनाया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने परीक्षाओं में पारदर्शिता और उम्मीदवारों के मूल्यांकन के तरीकों पर भी चर्चा की। जजों ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक सेवाओं में भर्ती की प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए ताकि मेधावी छात्र न्यायपालिका का हिस्सा बन सकें। जजों की इन टिप्पणियों को न केवल कानूनी नजरिए से, बल्कि उन लाखों छात्रों के लिए प्रेरणा के रूप में देखा जा रहा है जो हर साल कठिन परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।
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