
दमोह कलेक्ट्रेट में आयोजित जनसुनवाई में एक हृदयविदारक दृश्य देखने को मिला, जिसने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को साफ कर दिया। जबेरा तहसील के मुवार झरौली गांव से आई नीतू लोधी अपने बीमार पति की सांसों की भीख मांगने कलेक्ट्रेट पहुंची थीं, लेकिन प्रशासन के दो टूक जवाब ने उन्हें निराश कर दिया।
नीतू लोधी ने भारी मन से बताया कि पिछले दो वर्षों से उनके पति गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। इलाज के दौरान उनकी सारी जमा-पूंजी और संपत्ति बिक चुकी है। वर्तमान में उनके पति को जीवित रहने के लिए सप्ताह में कम से कम 2 से 3 ऑक्सीजन सिलेंडर की आवश्यकता होती है। नीतू के अनुसार, पहले जिला अस्पताल से सिलेंडर मिल जाता था, लेकिन अब वहां से भी मना कर दिया गया है। आर्थिक तंगी इतनी गहरी है कि बाजार से निजी तौर पर सिलेंडर रिफिल कराना उनके लिए नामुमकिन है।
इस मामले में पहले राज्य मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी ने हस्तक्षेप किया था, जिसके बाद मरीज को एम्स भेजा गया और स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से एक ऑक्सीजन कंसंट्रेटर भी उपलब्ध कराया गया। लेकिन नीतू का कहना है कि गांव में बार-बार होने वाली बिजली कटौती के कारण कंसंट्रेटर पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं बना पाता। ऐसी स्थिति में मरीज की जान बचाने के लिए केवल ऑक्सीजन सिलेंडर ही एकमात्र सहारा है।
जनसुनवाई के दौरान जब यह मामला कलेक्टर के सामने आया, तो उन्होंने जिला अस्पताल प्रबंधक को तलब किया। कलेक्टर ने स्पष्ट रूप से कहा कि:
"मरीज को अस्पताल में भर्ती रहने तक ऑक्सीजन दी जा सकती है, लेकिन नियमों के तहत हर मरीज को घर के लिए सरकारी सिलेंडर उपलब्ध कराना प्रशासनिक रूप से संभव नहीं है। इसकी व्यवस्था परिवार को स्वयं करनी होगी।"
प्रशासनिक मदद न मिलने से टूटी नीतू लोधी ने कलेक्ट्रेट परिसर में अपना आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने रोते हुए कहा कि यदि ऑक्सीजन की कमी से उनके पति की जान जाती है, तो वह अपने मासूम बच्चे के साथ पति की अस्थियां लेकर कलेक्ट्रेट आएंगी और प्रशासन को जवाबदेह ठहराएंगी।
वर्तमान स्थिति: राज्य मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी के निज सहायक ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा है कि कैबिनेट बैठक के बाद इस विषय को सीधे मंत्री जी के समक्ष रखा जाएगा। अब देखना यह है कि क्या सरकार इस विशेष परिस्थिति में नियमों में ढील देकर एक परिवार को उजड़ने से बचाती है या नहीं।
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