
अमरकंटक। मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी मां नर्मदा के पावन उद्गम स्थल अमरकंटक के समृद्ध व जैव-विविधता से परिपूर्ण जंगलों पर 'साल बोरर' (Hoplocerambyx spinicornis) नामक घातक कीट का गंभीर संकट गहरा गया है। वन विभाग के आधिकारिक सर्वेक्षण के अनुसार, अमरकंटक के 8,584 हेक्टेयर में फैले करीब 40 लाख साल (सखुआ) वृक्षों में से लगभग 60 हजार पेड़ इस विनाशकारी कीट के संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं।
संक्रमण की विनाशकारी श्रृंखला (चेन) को अन्य स्वस्थ पेड़ों तक फैलने से रोकने के लिए केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अमरकंटक क्षेत्र में 9,535 अति-संक्रमित पेड़ों की नियंत्रित कटाई को मंजूरी प्रदान की है। बारिश का मौसम समाप्त होने के उपरांत 15 अक्टूबर 2026 से वन विभाग ने कपिलधारा, सोनमुड़ा और अमरकंटक बीट में चिन्हांकित पेड़ों की कटाई का कार्य युद्धस्तर पर शुरू कर दिया है। विभाग अब तक 400 से अधिक संक्रमित पेड़ों को काटकर गिरा चुका है और जनवरी 2027 के अंत तक सभी 9,535 पेड़ों को हटाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
अमरकंटक साल वृक्षों के लिए पारिस्थितिकीय दृष्टि से एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। वन अधिकारियों का मानना है कि यदि काटे गए संक्रमित पेड़ों को अमरकंटक या उसके आसपास के जंगलों में डिपो बनाकर रखा गया, तो उनके भीतर छिपे कीट और प्यूपा निकलकर आसपास के शेष स्वस्थ वृक्षों को भी अपनी जद में ले लेंगे।
इस जैविक खतरे से निपटने के लिए वन विभाग ने काटे गए पेड़ों की मौके पर ही त्वरित छिलाई और छोटे लट्ठों में कटिंग कराने की रणनीति अपनाई है। इन लकड़ियों का स्थानीय भंडारण पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। इन सभी लट्ठों को सुरक्षित रूप से अमरकंटक वन क्षेत्र से बाहर निकालकर शहडोल जिले के नरसरा वन डिपो में भेजा जा रहा है, ताकि मुख्य वन संपदा सुरक्षित रह सके।
वन मंडलाधिकारी (DFO) अनूपपुर डेविड चनाप ने बताया कि 8,584 हेक्टेयर के 17 वन कक्षों में साल बोरर का संक्रमण देखा गया है। मध्य प्रदेश में इस प्रकोप की भयावहता को देखते हुए केंद्र सरकार ने अमरकंटक में 9,535 और पड़ोसी डिंडोरी जिले में 1.46 लाख पेड़ों की कटाई को स्वीकृति दी है। डीएफओ के अनुसार, कटाई से पूर्व विभाग की 16 समितियों के माध्यम से व्यापक अभियान चलाकर 40,200 साल बोरर कीटों को भौतिक रूप से पकड़कर नष्ट किया गया था।
राज्य वन अनुसंधान संस्थान (SFRI), जबलपुर के वैज्ञानिकों के दिशा-निर्देशों में संक्रमण की गंभीरता के आधार पर वृक्षों को T-1 से T-6 श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
T-1 और T-2 श्रेणी: अत्यधिक संक्रमित और अंदर से खोखले हो चुके मृतप्राय पेड़, जिन्हें काटना अनिवार्य है।
T-3 से T-6 श्रेणी: शुरुआती और मध्यम संक्रमण वाले पेड़, जहां उपचार व निगरानी के जरिए पेड़ को बचाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (IGNTU), अमरकंटक के पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. शिवाजी चौधरी के अनुसार, साल बोरर का एक मादा वयस्क कीट 250 से 300 अंडे देता है। मात्र 3 से 7 दिनों में अंडों से निकले लार्वा (सूंड़ी) पेड़ की छाल को छेदकर तने की आंतरिक काष्ठ (जाइलम/फ्लोएम) के भीतर घुस जाते हैं।
ये लार्वा महीनों तक लकड़ी को भीतर से खाकर पूरी तरह खोखला कर देते हैं, जिससे पेड़ पोषक तत्वों के अभाव में धीरे-धीरे सूखकर गिर जाता है। पेड़ से रिसने वाला प्राकृतिक राल (गोंद) इन कीटों को दूर से आकर्षित करता है। दिसंबर से अप्रैल के दौरान ये प्यूपा अवस्था में रहते हैं और मानसून के समय वयस्क बनकर बाहर निकलते हैं। वन विभाग अब 'ट्रैप ट्री पद्धति' (Trap Tree Method) का उपयोग कर रहा है, जिसमें कटे हुए ताजे साल के लट्ठों को जाल के रूप में रखकर वयस्क कीटों को आकर्षित किया जाता है और अंडे देने से पूर्व ही उन्हें नष्ट कर दिया जाता है।
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