
भोपाल. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में शुक्रवार को ऐप आधारित टैक्सी (App-based Cab Services) और बाइक-टैक्सी कंपनियों के खिलाफ ड्राइवरों का एक बेहद अनोखा और दिल दहला देने वाला प्रदर्शन देखने को मिला. 'भोपाल टैक्सी चालक संघ' के बैनर तले सैकड़ों की संख्या में टैक्सी और ऑटो ड्राइवर बोर्ड ऑफिस चौराहे पर एकत्रित हुए. अपनी बदहाली और आर्थिक तंगी को दर्शाने के लिए ड्राइवरों ने फटे हुए कपड़े पहन रखे थे और हाथों में कटोरा लेकर वे सड़कों पर प्रतीकात्मक रूप से भीख मांगते नजर आए.
"चड्डी-बनियान तक फट चुकी है..." – ड्राइवरों का छलका दर्द
प्रदर्शन के दौरान ड्राइवरों ने ओला (Ola), उबर (Uber) और रैपिडो (Rapido) कंपनियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की. उनका आरोप है कि इन मल्टीनेशनल कंपनियों की दमनकारी और मनमानी नीतियों ने उन्हें भुखमरी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है.
आंदोलन में शामिल एक टैक्सी ड्राइवर ने बेहद भावुक होते हुए अपना दर्द बयां किया:
"भैया, कंपनियों ने हमारी माली हालत ऐसी कर दी है कि हम अपने लिए नए कपड़े तक नहीं खरीद पा रहे हैं. हमारी चड्डी-बनियान तक फट चुकी है. कंपनियों के रेट्स (किराया) इतने कम हैं कि अब गाड़ी चलाना घाटे का सौदा साबित हो रहा है."
कमाई 9 और खर्च 11: गाड़ी की किस्त भरें या घर चलाएं?
टैक्सी चालक संघ के कार्यवाहक अध्यक्ष श्रवण कुमार शर्मा ने प्रदर्शन के पीछे के गणित को समझाते हुए बताया कि मौजूदा समय में ड्राइवरों का जीना क्यों दूभर हो गया है:
औसत कमाई: कंपनियों की तरफ से ड्राइवरों को वर्तमान में महज ₹9 प्रति किलोमीटर का औसत किराया मिल रहा है.
वास्तविक खर्च: डीजल, पेट्रोल और सीएनजी (CNG) की आसमान छूती कीमतों के कारण एक गाड़ी को सड़क पर दौड़ाने का न्यूनतम खर्च ही 11 प्रति किलोमीटर तक पहुंच चुका है.
किस्त बनाम परिवार: ड्राइवरों का कहना है कि इस स्थिति में वे हर दिन अपनी जेब से घाटा सह रहे हैं. अब हालात ऐसे हैं कि वे या तो अपने परिवार का पेट पाल सकते हैं या फिर गाड़ी की बैंक किस्त (EMI) भर सकते हैं. दोनों काम एक साथ करना पूरी तरह असंभव हो गया है.
कंपनियों पर आरटीओ (RTO) गाइडलाइन के उल्लंघन का आरोप
संघ के महामंत्री राजेश कुमार नागले ने क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) और कंपनियों के बीच की साठगांठ पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि साल 2014-15 में जब इन कंपनियों ने भोपाल में पैर पसारे थे, तब सरकारी गाइडलाइन और तय किराए का पालन किया गया था. लेकिन बाजार पर कब्जा जमाने के बाद कंपनियों ने मनमानी शुरू कर दी. कंपनियां एक विशेष प्रावधान का हवाला देकर सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम किराए से भी कम का भुगतान ड्राइवरों को कर रही हैं, जिससे ड्राइवरों का भयंकर शोषण हो रहा है.
चेतावनी: मांगें पूरी नहीं हुईं तो थमेगा भोपाल का चक्का
टैक्सी चालकों ने सरकार और प्रशासन पर भी अनदेखी का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि जब भी वे आंदोलन करते हैं, अधिकारी सिर्फ कोरा आश्वासन देकर मामला टाल देते हैं, लेकिन धरातल पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जाता.
संघ ने दो टूक लहजे में साफ कर दिया है कि किराया बढ़ाना और आरटीओ की गाइडलाइन लागू कराना ही एकमात्र समाधान है. यदि सरकार और कंपनियों ने जल्द ही उनकी मांगें स्वीकार नहीं कीं, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन और उग्र रूप लेगा और भोपाल शहर के भीतर टैक्सी, ऑटो और कैब सेवाओं को पूरी तरह से बंद (चक्का जाम) कर दिया जाएगा.
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