
भोपाल. मध्य प्रदेश में साइबर अपराधियों का नेटवर्क लगातार मजबूत होता जा रहा है, जबकि इनसे निपटने वाली साइबर पुलिस संसाधनों और मैनपावर की भारी कमी से जूझ रही है। राज्य में बीते एक साल के भीतर साइबर ठगी का आंकड़ा 600 करोड़ रुपये को पार कर चुका है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस महा-अपराध की जांच और विवेचना के लिए पूरे प्रदेश में आईटी एक्ट के तहत अधिकृत मात्र 19 पुलिस इंस्पेक्टर (Inspectors) ही तैनात हैं।
आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले चार वर्षों में प्रदेश में साइबर ठगी की रकम में 1100 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2025 में ही प्रदेशवासियों को 634 करोड़ रुपये की चपत लगी थी, जिसमें से पुलिस मुस्तैदी दिखाते हुए बैंकों में 137 करोड़ रुपये ही होल्ड करा सकी थी। चालू वर्ष में भी यह आंकड़ा 600 करोड़ रुपये के पार निकल चुका है, जो सुरक्षा तंत्र पर बड़े सवाल खड़े करता है।
साइबर अपराधों की जटिलता को देखते हुए जहां भारी मैनपावर की जरूरत है, वहीं हकीकत इसके उलट है:
स्वीकृत पद: वर्ष 2013 में साइबर पुलिस के लिए केवल 293 पद स्वीकृत किए गए थे।
मौजूदा स्थिति: सीधी भर्ती से केवल 54 पुलिसकर्मी मिले, बाकी जिला पुलिस बल से प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर लेकर लगभग 300 का अमला तैयार किया गया है।
जांच अधिकारी: आईटी एक्ट (IT Act) के तहत सिर्फ इंस्पेक्टर को ही विवेचना का अधिकार है, जिनकी संख्या महज 19 है। इसके अलावा 22 सब-इंस्पेक्टर हैं।
इकलौता थाना: पूरे प्रदेश के लिए साइबर का एकमात्र विशेष थाना भोपाल में स्थित है। बाकी जिलों में सामान्य जिला पुलिस थानों में ही एफआईआर दर्ज की जाती है, जिससे जांच में काफी समय बर्बाद होता है।
साइबर अपराधियों को पकड़ना भूसे में सूई ढूंढने जैसा काम हो गया है। अधिकतर आरोपी मध्य प्रदेश के बाहर बैठकर ठगी को अंजाम देते हैं। वे फर्जी दस्तावेजों पर ली गई सिम और दूसरे राज्यों के 'म्यूल अकाउंट्स' (Mule Accounts) का इस्तेमाल करते हैं।
"साइबर ठगी की जांच में आगे बढ़ने के मुख्य रूप से तीन ही रास्ते होते हैं—मोबाइल नंबर, बैंक खाता और सोशल मीडिया अकाउंट। सोशल मीडिया के लिए कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जबकि सिम और बैंक खातों की असली मालिक तक पहुंचने में लंबा समय लगता है।" — प्रणय नागवंशी, एसपी (साइबर), भोपाल
प्रदेश में हर साल साइबर ठगी को लेकर 2,500 से ज्यादा एफआईआर दर्ज की जा रही हैं। इसके अलावा अन्य साइबर अपराधों के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं। इसके बावजूद साइबर पुलिस का कोई अलग कैडर नहीं है। हालांकि, पुलिस मुख्यालय (PHQ) के अधिकारियों का दावा है कि जल्द ही साइबर पुलिस का एक अलग कैडर तैयार किया जाएगा और डिजिटल फॉरेंसिक लैब के संसाधन भी बढ़ाए जाएंगे।
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