
डिंडौरी जिले में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय में शासकीय राशि के बड़े गबन और दोहरे भुगतान का पर्दाफाश हुआ है। जबलपुर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने विस्तृत जांच के बाद करीब 60.60 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता में दो तत्कालीन सीएमएचओ, दो तत्कालीन जिला स्वास्थ्य अधिकारियों और लेखा शाखा के दो कर्मचारियों समेत कुल छह लोगों के खिलाफ अपराध क्रमांक 109/2026 के तहत एफआईआर दर्ज की है।
यह पूरा घोटाला 1 अप्रैल 2016 से 31 दिसंबर 2025 के बीच स्वास्थ्य विभाग के बजट और लेखा प्रणाली में नियमों को ताक पर रखकर अंजाम दिया गया। जांच में सामने आया कि आरोपियों ने आईएफएमआईएस (IFMIS) पोर्टल पर गलत एरियर गणना, पात्रता से अधिक भुगतान, भत्तों में हेराफेरी और वेंडरों को अवैध दोहरे भुगतान स्वीकृत कर शासन को लाखों रुपये की चपत लगाई।
ईओडब्ल्यू जबलपुर द्वारा दर्ज एफआईआर में नामजद आरोपियों के विवरण इस प्रकार हैं:
डॉ. आर.के. मेहरा: तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), डिंडौरी।
डॉ. रमेश सिंह मरावी: तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), डिंडौरी।
डॉ. बल्देव सिंह भलावी: तत्कालीन जिला स्वास्थ्य अधिकारी (DHO), डिंडौरी।
डॉ. भरत सिंह टेकाम: तत्कालीन जिला स्वास्थ्य अधिकारी (DHO), डिंडौरी।
गुलाब साहू: सहायक ग्रेड-3 एवं तत्कालीन लेखा शाखा प्रभारी, सीएमएचओ कार्यालय।
प्रकाश परस्ते: पर्यवेक्षक, सीएमएचओ कार्यालय, डिंडौरी।
ईओडब्ल्यू की फॉरेंसिक ऑडिट व जांच रिपोर्ट में फर्जीवाड़े के प्रमुख तरीके उजागर हुए हैं:-
फर्जी एरियर का भुगतान (49.89 लाख): आईएफएमआईएस पोर्टल पर बिना किसी वैधानिक आदेश और भौतिक सत्यापन के गलत एरियर गणना पत्रक अपलोड किए गए। पहले से भुगतान किए जा चुके हस्तलिखित एरियर को समायोजित करने के बजाय पोर्टल पर ऋणात्मक प्रविष्टियां दर्ज कर 49.89 लाख रुपये का नियमविरुद्ध भुगतान निकाला गया।
भत्तों में हेराफेरी (5.89 लाख): नॉन-प्रैक्टिस अलाउंस (NPA) और हाउस रेंट अलाउंस (HRA) के मद में बिना सक्षम प्रशासनिक स्वीकृति के बदलाव कर 5.89 लाख रुपये का अवैध अतिरिक्त भुगतान जारी किया गया।
लेखा प्रभारी को सीधे लाभ (4.78 लाख): तत्कालीन लेखा प्रभारी गुलाब साहू (सहायक ग्रेड-3) के खाते में जुलाई 2024 में पोर्टल के विशेष मॉड्यूल का उपयोग कर बिना किसी सक्षम आदेश के 4.78 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए।
वेंडरों को दोहरा भुगतान: सामग्री व सेवाओं की आपूर्ति करने वाले विक्रेताओं को भी दोहरे व संदेहास्पद भुगतान किए जाने के प्रमाण मिले हैं।
जांच में पुष्टि हुई कि आरोपियों ने 'मध्य प्रदेश कोषालय संहिता' और 'मध्य प्रदेश वित्तीय संहिता' के नियमों का खुला उल्लंघन करते हुए डिजिटल सिग्नेचर (DSC) के जरिए अपात्र बिलों को मंजूरी दी।
जबलपुर ईओडब्ल्यू ने आरोपियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (संशोधित 2018) की धारा 7(सी), 13(1)(ए), 13(2) तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(5) (आपराधिक विश्वासघात) और 61(2) (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत प्रकरण दर्ज किया है। जांच एजेंसी अब संदिग्ध बैंक खातों, ट्रांजेक्शन ट्रेल और डिजिटल लॉग्स की गहराई से पड़ताल कर रही है।
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