
नई दिल्ली. सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया में शुचिता और नियमों की कठोरता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक रोजगार (Public Employment) के मामलों में केवल किसी पिछड़े समुदाय से संबंधित होना उम्मीदवार के पक्ष में निर्णय लेने का आधार नहीं हो सकता। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने जोर देकर कहा कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए चयन प्रक्रिया में सहानुभूति, दान या करुणा जैसे भावों को दूर रखना आवश्यक है।
यह विवाद दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल पद की भर्ती से संबंधित है। एक उम्मीदवार ने शुरुआती परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली थीं, लेकिन जनवरी 2024 में आयोजित शारीरिक सहनशक्ति और मापन परीक्षण (Physical Test) में वह बीमारी का हवाला देकर अनुपस्थित रहा। उम्मीदवार ने बाद में दूसरे बैच के साथ परीक्षा देने की अनुमति मांगी। सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) और बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने उम्मीदवार के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अब पूरी तरह खारिज कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को 'गैर-जिम्मेदारी का क्लासिक उदाहरण' करार दिया। अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई कि करीब एक लाख उम्मीदवारों में से केवल इसी उम्मीदवार ने टेस्ट को दोबारा शेड्यूल करने की मांग की। पीठ ने टिप्पणी की, "जब अवसर दुर्लभ हों, तो उन्हें दोनों हाथों से पकड़ना चाहिए।" कोर्ट के अनुसार, निर्धारित तिथि पर उपस्थित न होना उम्मीदवार में प्रेरणा और पहल की कमी को दर्शाता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि उम्मीदवार बीमार था, तो उसे केंद्र पर रिपोर्ट करके अपनी स्थिति बतानी चाहिए थी।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक पदों पर भर्ती के लिए अधिसूचित शर्तों का सख्ती से पालन अनिवार्य है। किसी एक व्यक्ति के लिए नियमों में ढील देना उन हजारों अन्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने अनुशासन के साथ प्रक्रिया का पालन किया है। कोर्ट ने कहा कि सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर रियायत देने से चयन प्रक्रिया की गरिमा प्रभावित होती है और उम्मीदवार के पास परीक्षण को दोबारा शेड्यूल कराने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
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