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रामनगर: छोटे बड़े सफेदपोश मिलकर कर रहे अवैध बालू का दोहन


रामनगर: मध्य प्रदेश के सतना, मैहर, शहडोल और सीधी जिलों की सीमाओं से होकर बहने वाली जीवनदायिनी सोन नदी इन दिनों रेत माफियाओं के लिए 'अवैध कमाई की खदान' बन गई है। बाणसागर परियोजना और घड़ियाल अभ्यारण्य जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में नियमों को ताक पर रखकर दिन-रात मशीनों से बालू का सीना छलनी किया जा रहा है। खबर है कि इस पूरे खेल में क्षेत्र के रसूखदार सफेदपोशों, सत्ताधारी नेताओं और विपक्षी दबंगों का एक मजबूत सिंडिकेट सक्रिय है, जो प्रशासन की नाक के नीचे 'अवैध सोने' (बालू) का काला कारोबार चला रहा है।

प्रतिबंधित क्षेत्रों में सरेआम डकैती

सोन नदी की बालू अपनी गुणवत्ता के कारण निर्माण कार्यों के लिए पहली पसंद मानी जाती है। सूत्रों के अनुसार, बुढ़वा, गोपद बनास, सथनी और बनास क्षेत्र जैसे प्रतिबंधित इलाकों से, जहाँ घड़ियालों के संरक्षण के लिए मानवीय गतिविधियाँ वर्जित हैं, वहाँ बेखौफ होकर उत्खनन किया जा रहा है। माफिया फर्जी 'पिटपास' और 'रमन्ना' के सहारे आम जनता को ऊँची कीमतों पर घटिया बालू बेचकर चूना लगा रहे हैं।

दिखावे की कार्रवाई और 'फिक्स्ड' सिंडिकेट

हाल ही में 18 अप्रैल 2026 की रात अभ्यारण्य वन विभाग और रामनगर पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई कर 09 हाइवा पकड़े थे, जिन्हें रामपुर नैकिन थाने में खड़ा कराया गया। लेकिन जानकारों का कहना है कि यह केवल 'कोरम पूर्ति' है। माफिया और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के बीच का नेटवर्क इतना गहरा है कि कभी-कभी खुद माफिया ही आपसी रंजिश में एक-दूसरे की शिकायत कर छोटी-मोटी कार्रवाई करवाते हैं, ताकि प्रशासन की साख बची रहे और उनका बड़ा कारोबार बिना रुकावट चलता रहे।

बिना नंबर के दौड़ रहे वाहन, करोड़ों का वारा-न्याय

जिगना, उचेहरा, कंदवारी, मनकिसर, रामनगर और अमरपाटन जैसे रास्तों पर बिना रजिस्ट्रेशन नंबर वाले ट्रैक्टर और हाइवा थोक के भाव दौड़ रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि इस अवैध कारोबार की कमाई इतनी अधिक है कि हर महीने लाखों-करोड़ों रुपये 'लिफाफों' की शक्ल में जिम्मेदारों तक पहुँचाए जाते हैं। यही कारण है कि भारी मशीनों और जेसीबी के इस्तेमाल के बावजूद जिम्मेदार विभाग (राजस्व, खनिज और वन विभाग) अक्सर मौन साधे रहते हैं।

दबदबे का खेल: रसूखदारों का संरक्षण

क्षेत्रीय माफिया नई कारों और मोटरसाइकिलों में फर्राटे भरते हुए तथाकथित जन प्रतिनिधियों के साथ फोटो खिंचवाकर अपना दबदबा कायम रखते हैं। जब कभी दबाव बढ़ता है, तो एक-दो दिन के लिए काम रोक दिया जाता है, लेकिन मामला 'सुुलझते' ही रात के अंधेरे में फिर से सोन नदी का दोहन शुरू हो जाता है।

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