
रीवा। नवागत कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी की कार्यशैली और सख्ती ने जिले के प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। एक ओर जहाँ जनता कलेक्टर के त्वरित निर्णयों से खुश नजर आ रही है, वहीं दूसरी ओर जनपद पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारी व कर्मचारी उनके विरोध में उतर आए हैं। अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कर्मचारी संगठनों ने संभागीय कमिश्नर कार्यालय पहुँचकर कलेक्टर के खिलाफ ज्ञापन सौंपा है। कर्मचारियों का आरोप है कि काम का दबाव और कार्यप्रणाली उनके लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है।
दरअसल, रीवा में पदभार ग्रहण करने के बाद से ही कलेक्टर सूर्यवंशी एक्शन मोड में हैं। शुरुआती 20 दिनों के भीतर उन्होंने न केवल दूर-दराज के क्षेत्रों का भ्रमण किया, बल्कि कार्यालयों का औचक निरीक्षण भी शुरू कर दिया। सुबह दफ्तर पहुँचने पर जब अधिकांश कर्मचारी अनुपस्थित मिले, तो कलेक्टर ने मौके पर ही क्लास लगा दी। इसके बाद जनसुनवाई में उमड़ी भारी भीड़ ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिले में जमीनी स्तर पर जन समस्याओं का निराकरण नहीं हो पा रहा है, जिससे नाराज कलेक्टर ने कर्मचारियों को अपनी कार्यक्षमता सुधारने की कड़ी हिदायत दी।
विवाद की मुख्य वजह विभागीय समीक्षा बैठक बनी, विशेषकर जिला पंचायत और मनरेगा के कार्यों की समीक्षा के दौरान। जब यह तथ्य सामने आया कि रीवा जिला मनरेगा के प्रदर्शन में प्रदेश के 52 जिलों में नीचे से दूसरे (51वें) स्थान पर है, तो कलेक्टर का पारा चढ़ गया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कह दिया कि "नौकरी करनी है तो काम करना पड़ेगा, वरना जितना काम-उतना वेतन के लिए तैयार रहें।" कलेक्टर ने स्पष्ट कर दिया है कि शासन की योजनाओं का लाभ जनता तक पहुँचाना प्राथमिकता है और इसमें लापरवाही बरतने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
कलेक्टर के इस कड़े रुख से नाराज जिला पंचायत और जनपद पंचायत के कर्मचारी लामबंद हो गए हैं। कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि उन पर अनुचित दबाव बनाया जा रहा है। इसी विरोध के चलते उन्होंने कमिश्नर को ज्ञापन देकर कलेक्टर के कामकाज के तरीकों पर सवाल उठाए हैं। दूसरी तरफ, कलेक्टर अपने फैसले पर अडिग हैं; उनका मानना है कि रीवा में काम की रफ्तार बढ़ानी ही होगी और बिना काम किए अब सिस्टम नहीं चलेगा। फिलहाल, प्रशासन और कर्मचारियों के बीच का यह गतिरोध चर्चा का विषय बना हुआ है।
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