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ग्वालियर पीठ का सख्त आदेश: अब केवल MPPSC से ही होगी ADPO की भर्ती

लिपिकों से ADPO बनने का 10% कोटा रद्द

ग्वालियर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर पीठ ने राज्य के अभियोजन विभाग के सेवा नियमों पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए लिपिकीय वर्ग को सीधे सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी (ADPO) बनाने वाले 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटे को असंवैधानिक घोषित कर पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने इस व्यवस्था को बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए 'चोर रास्ते से अधिकारी बनाने जैसा कदम' करार दिया। न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया एवं न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की युगल पीठ ने स्पष्ट किया कि अब इन पदों पर किसी भी प्रकार की विभागीय पदोन्नति नहीं होगी, बल्कि शत-प्रतिशत पद केवल मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) द्वारा आयोजित खुली एवं निष्पक्ष सीधी भर्ती प्रक्रिया से ही भरे जाएंगे। अदालत ने यह राहत भी दी कि याचिका प्रस्तुत होने की तिथि से पहले इस कोटे से पदोन्नत हो चुके कर्मचारियों की सेवाओं पर इस आदेश का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, किंतु भविष्य में इस कोटे से कोई पदोन्नति नहीं हो सकेगी।

केवल लॉ डिग्री से कोई वकील नहीं बनता, बार परीक्षा व अदालती अनुभव जरूरी

सुनवाई के दौरान युगल पीठ ने अभियोजन के दायित्वों और लिपिकीय भूमिका के अंतर को रेखांकित किया। अदालत ने पाया कि अखिल भारतीय बार परीक्षा (AIBE) पास किए बिना और न्यायालयीन वकालत का व्यावहारिक जमीनी अनुभव लिए बिना कर्मचारियों को सीधे अदालतों में आपराधिक मुकदमों की पैरवी की जिम्मेदारी सौंपना न्याय की मूल भावना के खिलाफ है। पीठ ने कहा कि केवल विधि (LLB) की उपाधि प्राप्त कर लेने मात्र से कोई व्यक्ति अधिवक्ता नहीं बन जाता। लिपिकों का मुख्य काम दफ्तरों में फाइलें और प्रशासनिक रिकॉर्ड संभालना है, जबकि ADPO को अदालत में साक्षियों का मुख्य व प्रतिपरीक्षण करने, अकाट्य साक्ष्य प्रस्तुत करने और विधिक तर्कों से सरकार का पक्ष मजबूती से रखने की गंभीर जिम्मेदारी निभानी होती है।

संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन, विभागाध्यक्ष ने 2019 में ही की थी हटाने की सिफारिश

अदालत ने 1998 के सेवा नियमों का हवाला देते हुए बताया कि सहायक ग्रेड-3 के कर्मचारियों के लिए सहायक ग्रेड-2, सहायक ग्रेड-1 और अधीक्षक के रूप में पदोन्नति का क्रम पहले से तय है, जो सभी तृतीय श्रेणी पद हैं। एक ही मूल पद से तृतीय श्रेणी और सीधे द्वितीय श्रेणी राजपत्रित (Gazetted) पद पर पदोन्नति के दोहरे रास्ते होना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 16 (अवसर की समानता) का सीधा उल्लंघन है। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने 14 अक्टूबर 2002 को नियमों में संशोधन कर 7 वर्ष की सेवा और लॉ डिग्री धारक लिपिकों के लिए 10% कोटा तय किया था, जिसे अधिवक्ता रोहन शर्मा व अन्य ने वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी के माध्यम से चुनौती दी थी। सुनवाई में यह तथ्य भी सामने आया कि अभियोजन संचालक ने 4 जुलाई 2019 को ही शासन को पत्र लिखकर इस कोटे को खत्म करने की अनुशंसा की थी, क्योंकि पदोन्नत होकर बने अधिकारी अदालतों में मुकदमों की पैरवी में प्रभावी साबित नहीं हो रहे थे।

Date & Time : 2026-10-31 13:57:36

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