
नासिक में बहुराष्ट्रीय कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के कार्यालय में आठ महिला कर्मचारियों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न और जबरन मतांतरण के गंभीर आरोपों के बाद अब यह मामला देश की शीर्ष अदालत तक पहुँच गया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर धोखाधड़ी और जबरदस्ती से होने वाले मतांतरण को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कड़े निर्देश देने की मांग की गई है। यह याचिका टीसीएस नासिक कार्यालय की उन घटनाओं की पृष्ठभूमि में आई है, जिन्होंने कॉर्पोरेट जगत और सामाजिक विमर्श में हलचल मचा दी है।
अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका में तर्क दिया गया है कि धोखे से कराया गया मतांतरण न केवल व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता के विरुद्ध है, बल्कि यह देश की संप्रभुता, पंथनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता के लिए भी एक गंभीर खतरा पैदा करता है। याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत मिलने वाला 'धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार' किसी भी व्यक्ति को छल, बल या प्रलोभन के माध्यम से दूसरों का धर्म परिवर्तन कराने का लाइसेंस नहीं देता है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना की जाए और दोषियों के लिए कठोर सजा का प्रावधान हो।
इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उन दलीलों पर संज्ञान लिया जिनमें शरीयत के विरासत नियमों को महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण बताया गया है। याचिका में कहा गया है कि मौजूदा नियमों के तहत संपत्ति के अधिकार में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलता है, जो समानता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
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