
दतिया. सरकारी दफ्तरों में आरटीआई (RTI) के जवाब को लेकर अक्सर टालमटोल की खबरें आती हैं, लेकिन दतिया के महिला एवं बाल विकास विभाग में मंगलवार को जो हुआ, उसने सबको हैरान कर दिया। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के बदले जब विभाग ने भारी-भरकम फीस मांगी, तो वकील साहब सचमुच नोटों की गड्डियां लेकर पहुंच गए। इसके बाद दफ्तर में जो ड्रामा हुआ, उसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर 'लाइव शो' की तरह वायरल हो रहा है।
पूरा मामला आरटीआई कार्यकर्ता और अधिवक्ता शंभू गोस्वामी से जुड़ा है। उन्होंने विभाग से पिछले 10 वर्षों की जानकारी मांगी थी। विभाग ने इसे टालने के लिए संभवतः एक दांव चला और 83,000 पन्नों का हवाला देते हुए 1.66 लाख रुपए की फोटोकॉपी फीस जमा करने का पत्र थमा दिया। अधिकारियों को शायद लगा होगा कि इतनी बड़ी रकम सुनकर आवेदन वापस ले लिया जाएगा, लेकिन शंभू गोस्वामी अगले ही दिन पूरी नकदी लेकर जिला कार्यक्रम अधिकारी (DPO) के केबिन में धमक पड़े।
जब वकील ने मेज पर नोटों का ढेर लगाया, तो विभाग ने नकद लेने से साफ इनकार कर दिया। तर्क दिया गया कि सरकारी फीस केवल चालान के माध्यम से ही जमा की जा सकती है। इसी बात पर बहस छिड़ गई:
वकील का आरोप: अधिवक्ता गोस्वामी ने डीपो अरविंद उपाध्याय पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए और कहा कि विभाग जानकारी देने से डर रहा है।
अधिकारी का रिएक्शन: बहस इतनी बढ़ी कि डीपीओ अरविंद उपाध्याय अपना आपा खो बैठे। वायरल वीडियो में वे अपना कॉलर आगे करते हुए चिल्लाते नजर आ रहे हैं— "पकड़ो मेरा कॉलर... पकड़ो, थप्पड़ मारो मुझे!"
दफ्तर के भीतर अधिकारियों और वकील के बीच हुई इस नोकझोंक ने सरकारी कामकाज की मर्यादा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। डीपीओ का कहना है कि वे जानकारी देने को तैयार हैं, लेकिन प्रक्रिया नियमों के तहत (चालान से) ही होगी। वहीं, अधिवक्ता इसे भ्रष्टाचार छिपाने का तरीका बता रहे हैं।
फिलहाल, दतिया में यह "कॉलर कांड" चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग कह रहे हैं कि जहाँ बच्चों और महिलाओं के विकास की फाइलें दौड़नी चाहिए थीं, वहाँ अब हाई-वोल्टेज ड्रामे की रील बन रही है।
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